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एक राक्षसी को कैसे भगवान विष्णु ने बना दिया मां तुलसी?

जालंधर भगवान शिव का अंश था. उसमें कार्तिकेय और गणेश की तरह बल था लेकिन बुद्धि राक्षसी थी. उसने तीनों लोकों में अपना शासन स्थापित कर लिया था. वह महापापी था लेकिन उसका जीवन, उसकी पत्नी के सतीत्व की वजह से बच रहा था. आखिर कैसे भगवान विष्णु ने भंग किया तुलसी का सतीत्व, पढ़ें इस कहानी में.

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देवों के देव महादेव में जलंधर और तुलसी.
Courtesy: लाइफ ओके चैनल से साभार.

जलंधर भगवान शिव की क्रोधाग्नि से पैदा हुआ एक ऐसा राक्षस था, जिसके पराक्रम के सामने भगवान विष्णु भी नहीं टिक पाते थे. वह शिव का अंशज था. जलंधर की कथा शिवपुराण, देवी भागवत और स्कंद पुराण में भी मिलती है. भगवान शिव एक बार इंद्र पर क्रोधित हुए. तीनों लोकों में हाहाकार मच गया. 

सारे देवता भागकर देवगुरु बृहस्पति के पास गए. देवगुरु महादेव के पास गए और देवताओं ने क्रोध शांत करने की प्रार्थना की. भगवान शिव जब शांत हुए तो उन्होंने अपनी क्रोधाग्नि, गंगासागर में गिरा दी. वहीं उनकी क्रोधाग्नि से जलंधर का जन्म हुआ. जलंधर ही बड़ा होने पर शंखचूर्ण कहलाया. 

पंडित डॉ. अरुणेश शुक्ल बताते हैं कि जब जलंधर का जन्म हुआ तो सृष्टि में हाहाकार मच गई. वह शिव का अंशज था. संपूर्ण संसार में उसका रुदन गूंजने लगा. उसका रुदन सुनने के बाद ब्रह्मा, विष्णु भी उसके पास पहुंच गए. ब्रह्मा ने जलंधर को उठाया तो उनके आंसू छलक पड़े. वह परम प्रतापी था और राक्षसों का राजा बन गया.

जलंधर के पराक्रम से स्वर्ग लोक में मच गई थी तबाही

पंडिय मायेश द्विवेदी बताते हैं कि जलंधर ने सृष्टि के सभी बड़े राक्षसों को दास बना लिया. राक्षसराज के तौर पर दैत्यगुरु शुक्राचार्य ने उसका राज्याभिषेक कर दिया. जलंधर ने कालनेमी असुर की कन्या वृंदा से विवाह कर लिया. वह परम साध्वी थी. वृंदा भगवान विष्णु की अनन्य भक्त थीं. वह पतिव्रता स्त्री थी और अपनी तपस्या से इतना बल अर्जित कर लिया था कि जलंधर की स्थिति अमर जैसी हो गई थी. रणभूमि में कोई उसके सामने नहीं टिकता था. उसने इंद्र को उनके पद से हटाकर खुद स्वर्ग का राज हड़प लिया था. वह अभिमानी था. उसने भगवान शिव से भी शत्रुता मोल ले ली थी.

मां पार्वती को ही हरने की योजना बना बैठा था जलंधर

आचार्य कृष्ण देव बताते हैं कि जलंधर कैलाश पहुंचकर महादेव को चुनौती देने लगा. वह माता पार्वती के हरण की योजना बनाने लगा. भगवान शिव क्रोधित हो गए. उन्होंने जलंधर के विनाश के लिए संकल्प ले लिया. वह अपने अंश को मार नहीं पा रहे थे. उसकी पत्नी भगवान विष्णु की आराधना कर रही थी और सतीत्व के बल से भगवान शिव भी बंध गए थे. जब लगा कि यह युद्ध अंतहीन हो जाएगी तब भगवान विष्णु ने जलंधर के वध के लिए वृंदा से छल करने की योजना बनाई.

भगवान विष्णु ने भेष बदला और जलंधर की पत्नी वृंदा के पास पहुंच गए. वृंदा यह समझ ही नहीं पाई कि भगवान विष्णु ने जलंधर का भेष रखा है. वह भगवान विष्णु को अपना पति समझ बैठी. भगवान ने छल से उसका सतीत्व तोड़ दिया. सीतत्व भंग हुआ और जलंधर भगवान शिव के प्रहार को झेल नहीं पाया. उसकी मौत हो गई.

इस छल का विष्णु ने कैसे किया प्रायश्चित
वृंदा को जब सूचना मिली कि उसका पति युद्ध में वीरगति को प्राप्त हुआ तो वह विष्णु से पूछ बैठी कि यदि मेरे पति स्वर्गलोक गए तो आप कौन हैं? भगवान अपने वास्तविक चतुर्भुज रूप में आ गए. वृंदा ने कहा कि मैं आपकी अनन्य भक्त थी, मेरे साथ ऐसा छल क्यों किया? वृंदा ने भगवान को पाषाण बन जाने का शाप दे दिया.

और ऐसे जलंधर की पत्नी वृंदा बनी विष्णुप्रिया तुलसी
भगवान, अपने भक्तों के अधीन होते हैं. उन्होंने शाप स्वीकार और शालिग्राम का रुप रख लिया. मां लक्ष्मी ने वृंदा से कहा कि इससे सृष्टि का कर्म रुक जाएगा, वे सृष्टि पालक हैं. वृंदा ने उन्हें शाप मुक्त कर दिया और जलंधर के साथ सती हो गई. भागवत में एक कथा आती है कि वृंदा, गोलोक में मां राधा की सखी थी. उसकी इच्छा की ही पूर्ति भगवान विष्णु ने धरती लोक पर की थी. भगवान ने वृंदा को वरदान दिया कि तुम मेरी भार्या तुलसी बनोगी. भगवान शालीग्राम और तुलसी का विवाह आज भी भक्त कराते हैं. भगवान को बिना तुलसी दल चढ़ाए, पूजा पूर्ण नहीं मानी जाती. तुलसी मां को देवी मां जैसा ही पूजनीय माना जाता है. 

डिस्क्लेमर: यह कहानी पौराणिक मान्यताओं पर आधारित है. इंडिया डेली लाइव इन घटनाओं की पुष्टि नहीं करता है.