क्या होता है ग्रेड-पे और कैसे बढ़ती है कमाई? सरकारी नौकरी की सैलरी का समझें पूरा खेल
ग्रेड-पे सरकारी कर्मचारियों की पुरानी वेतन व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा था. छठे वेतन आयोग के दौरान पे-बैंड और ग्रेड-पे के आधार पर बेसिक सैलरी तय की जाती थी.
सरकारी नौकरी की तैयारी करने वाले युवाओं ने अक्सर वैकेंसी के नोटिफिकेशन में ग्रेड-पे का नाम जरूर सुना होगा. कई लोगों को लगता है कि नोटिफिकेशन में जितना ग्रेड-पे लिखा है, कर्मचारी को हर महीने उतनी ही सैलरी मिलती है. हालांकि, ऐसा नहीं है. ग्रेड-पे सरकारी पद के स्तर और वेतन संरचना से जुड़ी व्यवस्था का हिस्सा है, जिसके आधार पर कर्मचारी की सैलरी तय होती थी.
सरल भाषा में समझें तो ग्रेड-पे कर्मचारी के पद, जिम्मेदारी और स्तर से जुड़ी एक निर्धारित राशि होती थी. अलग-अलग पदों के लिए ग्रेड-पे अलग होता था. पद जितना ऊंचा होता था, उसकी वेतन संरचना भी उसी के अनुसार अलग होती थी.
सैलरी तय करने में ग्रेड-पे की भूमिका
छठे वेतन आयोग के दौरान सरकारी कर्मचारियों की सैलरी तय करने में ग्रेड-पे की महत्वपूर्ण भूमिका थी. हालांकि, 7वें वेतन आयोग के लागू होने के बाद ग्रेड-पे की पुरानी व्यवस्था को खत्म कर पे-मैट्रिक्स और पे लेवल की व्यवस्था लागू की गई. इसके बावजूद पुरानी सरकारी नौकरियों और वेतन संरचना को समझने के लिए ग्रेड-पे शब्द आज भी काफी इस्तेमाल होता है.
Also Read
ग्रेड-पे से कैसे तय होती थी बेसिक सैलरी?
पुरानी व्यवस्था में कर्मचारी का पे-बैंड और ग्रेड-पे मिलकर उसकी शुरुआती बेसिक सैलरी तय करने में मदद करते थे. उदाहरण के तौर पर, अगर किसी पद का शुरुआती पे-बैंड 9,300 रुपये और ग्रेड-पे 4,200 रुपये था, तो दोनों को जोड़कर शुरुआती बेसिक पे 13,500 रुपये मानी जाती थी.
हालांकि, 7वें वेतन आयोग के बाद वेतन तय करने का तरीका बदल गया. अब कर्मचारी को एक निर्धारित पे लेवल में रखा जाता है और पे-मैट्रिक्स में उसके पद के अनुसार शुरुआती वेतन तय होता है. इसके बाद प्रमोशन और सालाना वेतन वृद्धि के साथ कर्मचारी पे-मैट्रिक्स में आगे बढ़ता है.
डीए और एचआरए से बढ़ती है सैलरी
बेसिक पे के बाद कर्मचारी को अलग-अलग भत्ते मिलते हैं. इनमें महंगाई भत्ता यानी डीए सबसे महत्वपूर्ण होता है. डीए बेसिक पे के प्रतिशत के आधार पर तय किया जाता है और महंगाई के असर को कम करने के लिए दिया जाता है. इसके अलावा कर्मचारी को मकान किराया भत्ता यानी एचआरए भी मिल सकता है. इसकी राशि कर्मचारी की पोस्टिंग और शहर की श्रेणी समेत लागू नियमों पर निर्भर करती है. यात्रा भत्ता यानी टीए और अन्य अनुमन्य भत्ते भी कुल वेतन में जुड़ सकते हैं.
ऐसे निकलती है इन-हैंड सैलरी
सरकारी कर्मचारी की ग्रॉस सैलरी समझने का सामान्य तरीका है कि बेसिक पे में डीए, एचआरए और लागू अन्य भत्ते जोड़े जाएं. उदाहरण के लिए, अगर किसी कर्मचारी की बेसिक सैलरी 40,000 रुपये है और डीए 50 प्रतिशत है, तो डीए 20,000 रुपये होगा.
इसके बाद नियमों के अनुसार मिलने वाला एचआरए, टीए और अन्य भत्ते जोड़ने पर ग्रॉस सैलरी तैयार होती है. लेकिन कर्मचारी को बैंक खाते में मिलने वाली रकम ग्रॉस सैलरी से अलग होती है. इसमें से एनपीएस या अन्य लागू अंशदान, टैक्स और दूसरी कटौतियां घटने के बाद नेट इन-हैंड सैलरी मिलती है.
ग्रेड-पे और पे लेवल में अंतर समझें
इसलिए यह समझना जरूरी है कि ग्रेड-पे को सीधे कर्मचारी की मासिक सैलरी नहीं माना जा सकता. पुरानी व्यवस्था में यह वेतन संरचना का एक हिस्सा था, जबकि मौजूदा 7वें वेतन आयोग की व्यवस्था में पे-मैट्रिक्स लेवल के आधार पर वेतन तय होता है. किसी कर्मचारी की वास्तविक इन-हैंड सैलरी उसके बेसिक पे, डीए, एचआरए, अन्य भत्तों और लागू कटौतियों पर निर्भर करती है.