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भारतीय रेलवे में क्यों होती हैं अलग-अलग रंग की ट्रेनें? जानें क्या है नीले, लाल और सफेद का मतलब

भारतीय रेलवे में नीले, लाल और सफेद डिब्बों के रंग अलग-अलग तकनीक, सुरक्षा और सुविधाओं को दर्शाते हैं. रंग देखकर ट्रेन की गुणवत्ता और स्पीड का अंदाजा लगाया जा सकता है.

Km Jaya
Edited By: Km Jaya
भारतीय रेलवे में क्यों होती हैं अलग-अलग रंग की ट्रेनें? जानें क्या है नीले, लाल और सफेद का मतलब
Courtesy: Pinterest

नई दिल्ली: लगभग सभी लोगों अपनी जिंदगी में कभी न कभी ट्रेन से सफर जरूर करते हैं. क्या आपने कभी गौर किया है कि ट्रेन के कोच का रंग अलग-अलग होता है? क्या आपके मन में कभी यह सवाल आया है, आखिर ट्रेन के कोच के रंग अलग-अलग क्यों होते हैं?

पिछले कुछ सालों में भारतीय रेल ने अपनी ट्रेनों को कई अलग-अलग रंगों में रंगा है लेकिन आपको यह जानकर हैरानी होगी कि यह सिर्फ रंग-रोगन की बात नहीं है. हर रंग के पीछे एक पूरी कहानी छिपी है. एक ऐसी कहानी जो ट्रेन की इंजीनियरिंग, सुरक्षा मानकों और यात्रियों को मिलने वाले आराम के स्तर के बारे में बताती है. 

अगर आप इन रंगों का मतलब समझ जाएं, तो आप बिना अपना टिकट देखे ही यह अंदाजा लगा सकते हैं कि ट्रेन के अंदर बैठने का इंतजाम कैसा होगा और ट्रेन कितनी रफ्तार से दौड़ेगी. चलिए जानते हैं कि ट्रेन का हर खास रंग क्या संकेत देता है.

नीली ट्रेनें

आपने शायद कई बार नीले रंग की ट्रेनों में सफर किया होगा. इन ट्रेनों को भारतीय रेल की पहचान माना जाता है, जो आज भी देश के कई हिस्सों को आपस में जोड़ती हैं. नीले कोच पुरानी पीढ़ी के कोच हैं, जिन्हें इंटीग्रल कोच फैक्टरी ने बनाया है. अगर आप नीली ट्रेन में सफर कर रहे हैं, तो खुद को एक ऐसी मशीन में सवार समझिए, जिसने पिछले कई दशकों में लाखों भारतीयों को उनकी मंजिल तक पहुंचाया है. 

ये कोच लोहे से बने होते हैं और इनमें एयर-ब्रेक सिस्टम लगा होता है. नई ट्रेनों की तुलना में इन कोचों में सफर थोड़ा ज्यादा हिचकोले वाला लग सकता है और इनकी रफ्तार आम तौर पर 110 km/h तक ही सीमित होती है. फिर भी आज भी किफायती सफर के लिए ये सबसे पहली पसंद बने हुए हैं.

लाल ट्रेनें

इस लिस्ट में अगली बारी है लाल ट्रेनों की. जब आप रेलवे स्टेशनों पर पहुंचते हैं, तो आपको अक्सर लाल या गहरे मैरून रंग वाली ट्रेनें दिखाई देंगी. इन्हें Linke Hofmann Busch (LHB) कोच के नाम से जाना जाता है, और इनका डिजाइन जर्मन टेक्नोलॉजी पर आधारित है. इन लाल कोचों की सबसे बड़ी खासियत इनकी सुरक्षा है.

ये कोच लोहे के बजाय स्टेनलेस स्टील से बने होते हैं. इनकी एक अहम खासियत यह है कि किसी दुर्घटना की स्थिति में ये कोच एक-दूसरे के ऊपर चढ़ते या ढेर नहीं होते. इसके अलावा इनमें डिस्क ब्रेक लगे होते हैं और ये 160 km/h तक की रफ्तार पकड़ने में सक्षम होते हैं.

सफेद ट्रेनें

जब हम सफेद ट्रेनों की बात करते हैं, तो वे भारतीय रेलवे के आधुनिक रूप का प्रतीक होती हैं. ये कोई आम ट्रेनें नहीं हैं बल्कि ये 'सेल्फ-प्रोपेल्ड' यानी खुद से चलने वाली यूनिट के तौर पर काम करती हैं यानी इन्हें चलाने के लिए अलग से इंजन जोड़ने की जरूरत नहीं पड़ती. पूरी की पूरी ट्रेन ही इंजन का काम करती है. 

इनका सफेद रंग इनकी प्रीमियम पहचान को उभारने का काम करता है. इनके अंदर आपको विश्व-स्तरीय सुविधाएं मिलेंगी, जैसे घूमने वाली सीटें, ऑटोमैटिक दरवाजे और GPS-आधारित जानकारी देने वाले सिस्टम.