नई दिल्ली: आज के समय में WhatsApp का इस्तेमाल बेहद ही आम हो चला है. इस प्लेटफॉर्म पर आने वाले हर मैसेज पर विश्वास करना एक ट्रेंड बन चुका है. लोग ये भी नहीं सोचते हैं कि ये झूठ भी हो सकता है. चाहे फोटो हो या वीडियो… सैंकड़ों लोग अफवाहें फैलाने के लिए कई तरह के हथकंडे अपनाते हैं. कई मामलों में ऐसी अफवाहें लोगों के मन में डर पैदा करती हैं और हालात इतने बिगड़ जाते हैं कि हिंसा तक हो जाती है. भारत में बच्चा चोरी की अफवाहों के कारण हुई मॉब लिंचिंग की घटनाएं इसका गंभीर उदाहरण हैं.
जरा सोचिए, किसी के पास अगर कोई ऐसा वीडियो आता है, जिसमें दावा किया जाता है कि इलाके में बच्चा चोर घूम रहा है. लोग बिना सच जाने उसे शेयर करने लगते हैं. लोगों में इससे डर फैलता है. ऐसे में कई लोग तो किसी भी अनजान व्यक्ति को ही संदिग्ध मान लेते हैं. पिछले कई वर्षों में इस तरह की अफवाहों की बात सामने आई है. ज्यादातर मैसेज या वीडियो भी फेक निकलते हैं. इन घटनाओं से पता चलता है कि सोशल मीडिया पर फैली गलत जानकारी केवल लोगों को भ्रमित नहीं करती, बल्कि कभी-कभी किसी की जान के लिए भी खतरा बन सकती है.
भारत दुनिया में WhatsApp का सबसे बड़ा मार्केट है. परिवार, दोस्त, दफ्तर और मोहल्ले के लोग रोजाना बड़ी संख्या में मैसेज, फोटो और वीडियो शेयर करते हैं. ऐसे में गलत जानकारी को फैलने के लिए ज्यादा समय नहीं लगता. माइक्रोसॉफ्ट ने एक ग्लोबल सर्वे किया है, जिसके मुताबिक, 60 फीसद से ज्यादा भारतीय प्रतिभागियों ने कहा था कि उन्हें ऑनलाइन फेक न्यूज का सामना करना पड़ा. यह आंकड़ा सर्वे में शामिल ग्लोबल पार्टिसिपेंट्स के 57 प्रतिशत औसत से ज्यादा था.
एक अन्य सर्वे में 88 प्रतिशत भारतीय युवा, जो पहली बार मतदान करने वाले थे, ने फेक न्यूज को गंभीर समस्या माना. हालांकि, कई लोग ऐसे हैं जो यह पहचान नहीं पाते हैं कि जो जानकारी उनके पास आई है, वो सही है या गलत.
आज के जमाने में सच्चाई को चीख-चीख के भी कहो तो लोग नहीं सुनते. लेकिन फेक न्यूज की एक हल्की-सी चिंगारी भी बड़ी बन जाती है. डर पैदा करने वाला मैसेज लोगों को लगता है कि इसे तुरंत दूसरों तक पहुंचाना जरूरी है. उदाहरण के लिए, अगर किसी मैसेज में लिखा हो कि आपके इलाके में बच्चा चोर हैं, तो कई लोग पहले अपने परिवार और पड़ोसियों को सतर्क करना चाहेंगे. इस कोशिश में वे यह जांचना भूल सकते हैं कि दावा सही भी है या नहीं. यही जल्दबाजी गलत जानकारी को फैलाती है. कई बार लोग अच्छे इरादे से मैसेज आगे भेजते हैं, लेकिन अनजाने में अफवाह को बढ़ावा दे देते हैं.
WhatsApp पर ‘कई बार फॉरवर्ड किया गया’ लिखा हो, तो रुककर जानकारी की जांच करें. इसका मतलब अपने आप यह नहीं है कि मैसेज झूठा है, लेकिन सावधानी जरूरी है.
रिवर्स इमेज सर्च की मदद से पता लगाया जा सकता है कि कोई तस्वीर पहले कहां पोस्ट की गई थी. कई बार पुरानी फोटो को नई घटना बताकर शेयर किया जाता है.
किसी खबर की पुष्टि के लिए विश्वसनीय समाचार संस्थानों और स्वतंत्र फैक्ट-चेकिंग वेबसाइटों की मदद लें. सरकारी दावों की जांच के लिए प्रेस इन्फॉर्मेशन ब्यूरो (PIB) के फैक्ट-चेक माध्यम को भी देखा जा सकता है.
अगर कोई मैसेज बिना सबूत दिए तुरंत शेयर करने या किसी व्यक्ति के खिलाफ कदम उठाने के लिए कहता है, तो पहले उसकी सच्चाई जांचें.
हर गलत मैसेज जानलेवा नहीं होता और हर फॉरवर्ड झूठा भी नहीं होता. लेकिन बिना जांचे किसी गंभीर आरोप या डर फैलाने वाली जानकारी को आगे भेजना नुकसान पहुंचा सकता है. इसलिए अगली बार WhatsApp पर कोई चौंकाने वाला वीडियो या मैसेज आए, तो खुद से एक सवाल जरूर पूछें- क्या मैं इसे इसलिए शेयर कर रहा हूं क्योंकि यह सच है, या इसलिए क्योंकि इसे देखकर मुझे डर या गुस्सा आया है? कुछ सेकंड रुककर की गई जांच किसी बड़ी गलतफहमी को फैलने से रोक सकती है. डिजिटल दुनिया में जिम्मेदार नागरिक बनने की शुरुआत इसी छोटी-सी आदत से होती है.