उत्तराखंड में भूस्खलन की बढ़ती घटनाओं के बीच एक नए शोध ने चिंता बढ़ा दी है. आधुनिक तकनीकों से किए गए अध्ययन में राज्य के हजारों भूस्खलन स्थलों का विश्लेषण किया गया. रिपोर्ट के मुताबिक पर्वतीय जिलों में जोखिम अधिक है, जबकि मैदानी इलाकों में स्थिति अपेक्षाकृत सुरक्षित बनी हुई है.
शिव नादर विश्वविद्यालय की डिजास्टर मैनेजमेंट लेबोरेटरी के शोधकर्ताओं ने करीब 53,400 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र का अध्ययन किया. रिपोर्ट में उत्तरकाशी, चमोली और पिथौरागढ़ के उच्च हिमालयी क्षेत्रों को सबसे अधिक भूस्खलन प्रभावित बताया गया. विशेषज्ञों के अनुसार अधिक वर्षा, तीखी ढलान, कमजोर भूगर्भीय संरचना और कठिन पर्वतीय भू-आकृति इन इलाकों में जोखिम बढ़ाने वाले प्रमुख कारण हैं. इसके विपरीत हरिद्वार और ऊधम सिंह नगर में खतरा सबसे कम पाया गया.
अध्ययन के दौरान भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण के रिकॉर्ड के आधार पर 7,182 पुराने भूस्खलन स्थलों का विश्लेषण किया गया. इनमें चट्टानों, मलबे और मिट्टी से जुड़े भूस्खलन शामिल रहे. शोधकर्ताओं ने पूरे राज्य को पांच संवेदनशीलता श्रेणियों में बांटा, जिसमें 18.47 प्रतिशत क्षेत्र उच्च और अति उच्च जोखिम वाले वर्ग में रखा गया. लगभग 21 प्रतिशत क्षेत्र मध्यम जोखिम श्रेणी में शामिल है.
वैज्ञानिकों ने भूस्खलन जोखिम का आकलन करने के लिए ऊंचाई, ढलान, भूगर्भीय संरचना, मिट्टी का प्रकार, भूमि उपयोग, वर्षा, नदी और सड़क से दूरी सहित कुल 16 मानकों का उपयोग किया. इसके लिए यूएसजीएस, भारतीय मौसम विभाग, जीएसआई, नासा और यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी के आंकड़ों का सहारा लिया गया. शोधकर्ताओं का मानना है कि यह जोखिम मानचित्र भविष्य में आपदा प्रबंधन और सुरक्षित विकास योजनाएं बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है.