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Independence Day 2026: श्रीदेव सुमन से राजा विजय सिंह तक, उत्तराखंड के वीरों ने कैसे लिखी आजादी की नई इबारत?

15 अगस्त पर जब पूरा देश स्वतंत्रता सेनानियों को नमन करता है, तब उत्तराखंड की धरती का संघर्ष भी याद किया जाना चाहिए. 1824 की कुंजा क्रांति, 1921 का कुली बेगार आंदोलन, 1942 की सल्ट क्रांति और श्रीदेव सुमन की शहादत इस इतिहास के अहम पड़ाव हैं.

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Edited By: Reepu Kumari
Independence Day 2026: श्रीदेव सुमन से राजा विजय सिंह तक, उत्तराखंड के वीरों ने कैसे लिखी आजादी की नई इबारत?
Courtesy: ChatGPT

15 अगस्त की कहानी सिर्फ दिल्ली के लाल किले तक सीमित नहीं है. हिमालय की गोद में बसे उत्तराखंड ने भी आजादी की लड़ाई में ऐसे अध्याय लिखे, जिन्हें देश के इतिहास में विशेष स्थान मिला. यहां लोगों ने अंग्रेजी शासन के साथ-साथ बेगार, जंगलों के अधिकार और सम्मानजनक जीवन के लिए भी लंबा संघर्ष किया.

उत्तराखंड का स्वतंत्रता आंदोलन कई अलग-अलग पड़ावों से होकर गुजरा. 1824 में अंग्रेजों के खिलाफ सशस्त्र विद्रोह से शुरुआत हुई, फिर 1857 की क्रांति की गूंज पहाड़ तक पहुंची. गांधी के असहयोग आंदोलन, कुली बेगार जनआंदोलन और 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन ने इस संघर्ष को राष्ट्रीय स्वर दिया. वहीं टिहरी में जनता राजशाही के खिलाफ भी अपने अधिकारों के लिए लड़ती रही.

जब 1857 से पहले ही पहाड़ ने अंग्रेजों को ललकार दिया

उत्तराखंड के इतिहास में 1824 की कुंजा बहादुरपुर क्रांति एक महत्वपूर्ण पड़ाव मानी जाती है. हरिद्वार क्षेत्र में राजा विजय सिंह ने अंग्रेजी सत्ता के खिलाफ विद्रोह का नेतृत्व किया और करीब एक हजार लोगों को अपने साथ संगठित किया. उन्होंने ब्रिटिश शासन को कर देना बंद कर दिया और स्थानीय स्तर पर उसके प्रभाव को चुनौती दी. विद्रोह बढ़ने पर अंग्रेजी सेना ने कुंजा के किले पर हमला किया. संघर्ष में अनेक स्थानीय योद्धा मारे गए, जबकि राजा विजय सिंह और उनके सेनापति कल्याण सिंह को पकड़कर मौत के घाट उतार दिया गया. यह घटना इसलिए ऐतिहासिक है क्योंकि यह 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम से लगभग 33 वर्ष पहले हुई थी.

काली कुमाऊं से जंगलों तक बढ़ता गया प्रतिरोध

1857 की क्रांति जब मेरठ से पूरे देश में फैली, तब कुमाऊं भी उससे अछूता नहीं रहा. काली कुमाऊं और चंपावत क्षेत्र में अंग्रेजी शासन के खिलाफ स्थानीय विरोध सामने आया. कालू सिंह महरा जैसे नेताओं ने लोगों को संगठित कर प्रतिरोध की भावना को मजबूत किया. इसी दौरान अंग्रेजों के वन कानूनों ने ग्रामीण जीवन को प्रभावित करना शुरू किया. जंगल, जो पहाड़ी परिवारों की खेती, पशुपालन और ईंधन का आधार थे, उन पर सरकारी नियंत्रण बढ़ गया. इसके विरोध में 1920 के दशक में कई क्षेत्रों में वन अधिकार आंदोलन हुए और प्रशासन को ग्रामीण शिकायतों की जांच के लिए विशेष समिति बनानी पड़ी.

उत्तरायणी मेले में बदली बेगार के खिलाफ जनता की तकदीर

महात्मा गांधी के असहयोग आंदोलन ने पहाड़ के गांवों में नई राजनीतिक चेतना जगाई. विदेशी कपड़ों के बहिष्कार, खादी के प्रचार और जनसभाओं के साथ स्थानीय मुद्दे राष्ट्रीय आंदोलन से जुड़ने लगे. इसी माहौल में कुली बेगार आंदोलन ने ऐतिहासिक रूप लिया. 14 जनवरी 1921 को बागेश्वर के उत्तरायणी मेले में हजारों लोग सरयू नदी के किनारे जुटे. बद्रीदत्त पांडे समेत कई नेताओं के नेतृत्व में लोगों ने जबरन मजदूरी न करने की शपथ ली. आंदोलन का सबसे प्रतीकात्मक क्षण तब आया, जब बेगार से जुड़े सरकारी रजिस्टर सरयू नदी में बहा दिए गए. यह अंग्रेजी शासन के खिलाफ सामूहिक अस्वीकार का ऐलान था.

सल्ट में चली गोलियां, चार शहादतों ने बदल दिया इतिहास

1942 में गांधी के भारत छोड़ो आह्वान के बाद उत्तराखंड के अल्मोड़ा, पौड़ी, द्वाराहाट, रानीखेत और सल्ट सहित कई क्षेत्रों में आंदोलन तेज हो गया. सभाएं, जुलूस और तिरंगा फहराने के प्रयासों ने अंग्रेजी प्रशासन की चिंता बढ़ा दी. 5 सितंबर 1942 को सल्ट के खुमाड़ में विरोध प्रदर्शन के दौरान पुलिस ने गोली चला दी. इस गोलीकांड में खीमानंद, गंगाराम, बहादुर सिंह और चूड़ामणि शहीद हो गए. यही घटना सल्ट को "कुमाऊं की बारडोली" के नाम से पहचान दिलाने वाली बनी और उत्तराखंड के स्वतंत्रता संघर्ष का सबसे भावनात्मक अध्याय बन गई.

देश आजाद हुआ, लेकिन टिहरी की कहानी दो साल बाद पूरी हुई

टिहरी रियासत का संघर्ष बाकी उत्तराखंड से अलग था. यहां अंग्रेज सीधे शासन नहीं करते थे, बल्कि जनता राजशाही की नीतियों के खिलाफ आवाज उठा रही थी. जंगल और जमीन के अधिकारों को लेकर असंतोष बढ़ा और 1930 का तिलाड़ी कांड इस आंदोलन का बड़ा मोड़ बना. 1939 में टिहरी राज्य प्रजामंडल की स्थापना हुई और श्रीदेव सुमन इसके सबसे प्रमुख चेहरों में उभरे. गिरफ्तारी के बाद उन्होंने जेल में आमरण अनशन किया और 25 जुलाई 1944 को शहादत दी. भारत 15 अगस्त 1947 को स्वतंत्र हो गया, लेकिन टिहरी रियासत तब भी भारतीय संघ का हिस्सा नहीं बनी. आखिरकार 1949 में उसका भारत में विलय हुआ और उत्तराखंड की आजादी का यह अध्याय पूर्ण हुआ.