देहरादून: उत्तराखंड सरकार ने राज्य में पारदर्शी और प्रभावी प्रशासन की दिशा में एक बड़ा कदम उठाया है. राज्यपाल लेफ्टिनेंट जनरल (सेवानिवृत्त) गुरमीत सिंह ने देवभूमि परिवार अधिनियम 2026 को मंजूरी दे दी है, जिसके बाद यह कानून लागू हो गया है. इस नई व्यवस्था के तहत राज्य में रहने वाले परिवारों के लिए एक केंद्रीयकृत डेटाबेस तैयार किया जाएगा और प्रत्येक परिवार को एक विशिष्ट देवभूमि परिवार आईडी प्रदान की जाएगी.
सरकार के अनुसार, इस पहल का उद्देश्य विभिन्न सरकारी योजनाओं और सेवाओं के लाभार्थियों का एकीकृत रिकॉर्ड तैयार करना है. लंबे समय से उत्तराखंड में निवास कर रहे परिवारों को इस नई व्यवस्था का लाभ मिलेगा. विशेष रूप से 15 वर्षों से राज्य में रह रहे नागरिकों को इस पहचान प्रणाली के अंतर्गत शामिल किया जाएगा.
मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने कहा कि वर्तमान में विभिन्न विभाग अपनी-अपनी योजनाओं के लिए अलग-अलग लाभार्थी डेटाबेस का उपयोग करते हैं. इससे आंकड़ों में दोहराव, बार-बार सत्यापन की आवश्यकता और विभागों के बीच समन्वय की कमी जैसी समस्याएं उत्पन्न होती हैं. नई देवभूमि परिवार आईडी व्यवस्था इन चुनौतियों को दूर करने में मदद करेगी.
नई प्रणाली के तहत प्रत्येक परिवार को एक विशिष्ट पहचान संख्या प्रदान की जाएगी. यह संख्या परिवार की डिजिटल पहचान के रूप में कार्य करेगी. इसमें परिवार के सदस्यों से जुड़ी महत्वपूर्ण जानकारियां जैसे नाम, आयु, आधार से संबंधित विवरण, सामाजिक-आर्थिक स्थिति, शिक्षा और रोजगार संबंधी जानकारी दर्ज की जाएगी.
सरकार का मानना है कि इस कदम से सरकारी योजनाओं के संचालन में पारदर्शिता बढ़ेगी और फर्जी लाभार्थियों की पहचान आसान होगी. कई बार योजनाओं में डुप्लीकेट या अपात्र लोगों को लाभ मिलने की शिकायतें सामने आती रही हैं. एकीकृत डेटाबेस बनने से ऐसी अनियमितताओं को रोकने में सहायता मिलेगी और वास्तविक पात्र लोगों तक योजनाओं का लाभ पहुंच सकेगा.
कानून में डेटा सुरक्षा को भी विशेष महत्व दिया गया है. यदि कोई व्यक्ति या संस्था इस केंद्रीयकृत डेटाबेस में अवैध तरीके से सेंधमारी करने या डेटा का दुरुपयोग करने का प्रयास करती है, तो उसके खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी. ऐसे मामलों में 10 वर्ष तक की जेल और 50 लाख रुपये तक के जुर्माने का प्रावधान रखा गया है.
इस कानून की एक विशेष बात यह भी है कि परिवार की पहचान में महिलाओं को प्राथमिकता दी गई है. प्रावधान के अनुसार, 18 वर्ष या उससे अधिक आयु की परिवार की सबसे वरिष्ठ महिला को परिवार का मुखिया माना जाएगा. सरकार का मानना है कि इससे महिलाओं की भूमिका को अधिक महत्व मिलेगा और सामाजिक सशक्तिकरण को बढ़ावा मिलेगा.