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चारधाम यात्रा 2026: आज से बद्रीनाथ धाम के कपाट खुले, 25 क्विंटल फूलों से सजा मंदिर; हजारों भक्तों ने लगाए जयकारे

उत्तराखंड के बद्रीनाथ धाम के कपाट आज सुबह सवा 6 बजे पूरे विधि-विधान से खोल दिए गए. 149 दिनों बाद भगवान बद्रीविशाल ने भक्तों को दर्शन दिए.

ANI
Reepu Kumari

बद्रीनाथ धाम: पवित्र चारधाम यात्रा 2026 की शुरुआत हो चुकी है. आज सुबह बद्रीनाथ धाम के कपाट खुले तो पूरा मंदिर भक्ति और आस्था से गूंज उठा. सवा 6 बजे विधि-विधान के साथ जब विशाल कपाट खुले तो हजारों श्रद्धालुओं ने ‘जय बद्रीविशाल’ के नारे लगाए. मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की मौजूदगी में यह पावन क्षण और भी यादगार हो गया.

मंदिर को इस बार खासतौर पर सजाया गया है. करीब 25 क्विंटल फूलों से मंदिर की सजावट की गई है. पहली बार फूलों से ‘ओम लक्ष्मीपति नमो’, ‘जय श्री बद्री नारायण’ और ‘वैकुंठाय नमो’ लिखा गया है, जो देखने वालों के मन को मोह ले रहा है.

ऐतिहासिक क्षण और सजावट

सुबह के समय हजारों भक्तों की उपस्थिति में कपाट खुलने का यह पावन अवसर बेहद भावुक करने वाला रहा. मंदिर परिसर को रंग-बिरंगे फूलों से सजाया गया. भगवान बद्रीनाथ की मूर्ति के चारों ओर फूलों की माला और खास सजावट ने धाम की दिव्यता को और बढ़ा दिया.

चारधाम यात्रा का पूरा कार्यक्रम

चारधाम यात्रा की शुरुआत 19 अप्रैल को अक्षय तृतीया पर यमुनोत्री और गंगोत्री धाम के कपाट खुलने से हुई थी. 22 अप्रैल को केदारनाथ धाम के कपाट खुले और अब बद्रीनाथ धाम के कपाट खुलने के साथ यात्रा पूरी तरह शुरू हो गई है. 

क्यों बंद रहते हैं कपाट?

चारों धाम ऊंचे हिमालयी क्षेत्र में स्थित हैं. सर्दियों में यहां भारी बर्फबारी और कड़ी ठंड पड़ती है. इसलिए हर साल अक्टूबर-नवंबर में कपाट बंद कर दिए जाते हैं. लगभग 149 दिन बंद रहने के बाद अप्रैल-मई में फिर से खोले जाते हैं. 

भगवान बद्रीविशाल कौन हैं?

बद्रीनाथ धाम में भगवान विष्णु स्वयं बद्रीविशाल के रूप में विराजमान हैं. गर्भगृह में उनके साथ माता लक्ष्मी भी मौजूद रहती हैं. साथ ही उद्धव जी और धनपति कुबेर भी गर्भगृह में विराजमान हैं. इसीलिए इस मंदिर को बदरीनारायण मंदिर के नाम से भी जाना जाता है.

बद्रीनाथ नाम कैसे पड़ा?

पौराणिक कथा के अनुसार, एक बार माता लक्ष्मी भगवान विष्णु से रूठकर बैकुंठ छोड़ गईं. तब भगवान विष्णु बद्रीनाथ क्षेत्र में आए और बदरी के वनों में तपस्या करने लगे. जब लक्ष्मी जी शांत होकर यहां पहुंचीं तो उन्होंने देखा कि श्रीहरि बदरी के पेड़ों के नीचे तपस्या कर रहे हैं. बदरी का अर्थ बेर का फल होता है. तभी लक्ष्मी जी ने उन्हें ‘बद्रीनाथ’ कहा. धाम का अर्थ है निवास स्थान, यानी भगवान बद्रीनाथ का निवास स्थल.

यात्रा का महत्व

चारधाम यात्रा उत्तराखंड की आर्थिक रीढ़ है. लाखों श्रद्धालु हर साल इन धामों में दर्शन के लिए आते हैं. इससे स्थानीय लोगों को रोजगार मिलता है. इस बार भी भक्तों की भारी भीड़ आने की उम्मीद है.