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India Daily

वाहन किराये में कथित घोटाले का आरोप: यूपी में 54,600 रुपए मासिक भुगतान पर उठे सवाल, CBI जांच की मांग

 उत्तर प्रदेश के अल्पसंख्यक कल्याण विभाग में वाहन किराये के भुगतान को लेकर अनियमितताओं के आरोप लगाए गए हैं. आरटीआई कार्यकर्ता ने केंद्रीय जांच, स्वतंत्र ऑडिट और जवाबदेही की मांग की है.

Sagar
Edited By: Sagar Bhardwaj
Anuj Kumar
Reported By: Anuj Kumar
वाहन किराये में कथित घोटाले का आरोप: यूपी में 54,600 रुपए मासिक भुगतान पर उठे सवाल, CBI जांच की मांग
Courtesy: AI

उत्तर प्रदेश के अल्पसंख्यक कल्याण विभाग में अधिकारियों के लिए किराये पर वाहन लेने के मद में सरकारी धन के इस्तेमाल को लेकर सवाल उठाए गए हैं. आरटीआई एवं मानवाधिकार कार्यकर्ता इंजीनियर मो. तलहा अंसारी ने केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह को शिकायत भेजकर वर्ष 2020 से अब तक किए गए भुगतानों की उच्चस्तरीय जांच कराने की मांग की है. शिकायत में वाहन मद संख्या-42 के तहत निजी एजेंसियों को भुगतान किए जाने के तरीके पर सवाल उठाए गए हैं.

प्रति वाहन 54,600 रुपए मासिक भुगतान का दावा

शिकायतकर्ता का आरोप है कि उत्तर प्रदेश के लगभग 80 प्रतिशत जिलों में अधिकारियों के लिए किराये पर वाहन लेने के नाम पर करीब 52,000 रुपए और उस पर 5 प्रतिशत जीएसटी जोड़कर 54,600 रुपए प्रति वाहन प्रतिमाह तक भुगतान किया जा रहा है. उन्होंने सवाल उठाया है कि अलग-अलग जिलों में वाहनों की जरूरत, उपलब्धता और इस्तेमाल की परिस्थितियां अलग होने के बावजूद भुगतान की राशि लगभग समान कैसे हो सकती है. इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि अभी बाकी है.

फर्जी बिलिंग और कमीशनखोरी की आशंका

शिकायत में आशंका जताई गई है कि कुछ मामलों में वास्तविक वाहन सेवा उपलब्ध कराए बिना कागजी अनुबंधों और बिलों के आधार पर भुगतान लिया गया हो सकता है. इसके अलावा, संबंधित एजेंसियों के भुगतान में कथित तौर पर लगभग 5 प्रतिशत कमीशन की व्यवस्था होने का आरोप भी लगाया गया है. शिकायतकर्ता ने इन आरोपों की पुष्टि के लिए अनुबंधों, मासिक बिलों, भुगतान वाउचर और विभागीय रिकॉर्ड की स्वतंत्र जांच कराने की मांग की है. फिलहाल इन आरोपों को प्रमाणित तथ्य नहीं माना जा सकता.

सरकारी वाहन होने पर निजी एजेंसियों की जरूरत क्यों?

इंजीनियर तलहा अंसारी ने विभागीय मुख्यालय में सरकारी वाहनों की उपलब्धता के बावजूद निजी एजेंसियों से वाहन किराये पर लेने की आवश्यकता पर सवाल उठाए हैं. उन्होंने मांग की है कि यह जांच की जाए कि सरकारी वाहनों की उपलब्धता कितनी थी और निजी वाहनों की सेवाएं लेने का निर्णय किन परिस्थितियों में किया गया. शिकायत में अधिकारियों की आवाजाही, तय दूरी, वाहन उपयोग और भुगतान की अनुमति से संबंधित रिकॉर्ड की जांच पर भी जोर दिया गया है.

GeM, GPS और FASTag रिकॉर्ड की जांच की मांग

शिकायतकर्ता ने जांच के लिए सरकारी ई-मार्केटप्लेस (GeM) के टेंडर, सर्विस ऑर्डर, अनुबंध, वाहन पंजीकरण प्रमाणपत्र, बीमा, फिटनेस, परमिट और प्रदूषण प्रमाणपत्रों का सत्यापन कराने की मांग की है. इसके साथ ही GPS डेटा, FASTag और टोल रिकॉर्ड, ईंधन खरीद, वाहन सर्विसिंग तथा चालकों के विवरण की जांच का अनुरोध किया गया है. उनका कहना है कि इन रिकॉर्ड का मिलान करके पता लगाया जा सकता है कि भुगतान की अवधि में संबंधित वाहन वास्तव में उपलब्ध थे या नहीं.

बैंक खातों और वित्तीय लेन-देन की भी हो जांच

शिकायत में एजेंसियों के GST और PAN विवरण, बैंक खातों, फर्म के स्वामित्व तथा वास्तविक वाहन उपलब्धता की जांच की मांग की गई है. शिकायतकर्ता के अनुसार, वित्तीय लेन-देन का सत्यापन सरकारी धन के इस्तेमाल की वास्तविक स्थिति स्पष्ट करने में मदद कर सकता है. उन्होंने वर्ष 2020 से अब तक वाहन मद संख्या-42 के तहत किए गए सभी भुगतानों का स्वतंत्र ऑडिट कराने का भी अनुरोध किया है.

केंद्रीय जांच एजेंसी को मामला सौंपने की मांग

तलहा अंसारी ने मूल बिल, वाउचर, ई-ऑफिस फाइल, GeM रिकॉर्ड, भुगतान संबंधी दस्तावेज और इलेक्ट्रॉनिक डेटा सुरक्षित रखने की मांग की है. उन्होंने आग्रह किया है कि मामले की जांच केवल विभागीय स्तर तक सीमित न रहे और जरूरत पड़ने पर सक्षम केंद्रीय जांच एजेंसी या सीबीआई को सौंपी जाए. यदि जांच में वित्तीय अनियमितताएं प्रमाणित होती हैं, तो संबंधित अधिकारियों और एजेंसियों के खिलाफ एफआईआर, विभागीय कार्रवाई तथा सरकारी धन की वसूली की जाए.

जांच के बाद स्पष्ट होगी भुगतान की वास्तविक स्थिति

शिकायतकर्ता ने सरकारी खर्च में पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करने पर जोर दिया है. हालांकि, फिलहाल ये आरोप शिकायत में उठाए गए हैं और इनकी स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है. संबंधित विभाग या अधिकारियों की प्रतिक्रिया और किसी आधिकारिक जांच के निष्कर्ष सामने आने के बाद ही भुगतान की प्रक्रिया तथा संभावित अनियमितताओं की वास्तविक स्थिति स्पष्ट हो सकेगी. बता दें कि यह शिकायत उत्तर प्रदेश के बाबाबंकी के रहने वाले और आरटीआई एवं मानवाधिकार कार्यकर्ता इंजीनियर मो. तलहा अंसारी ने दर्ज कराई है.