उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी के बलिदान दिवस पर उन्हें भावपूर्ण श्रद्धांजलि दी है. सोशल मीडिया मंच एक्स पर किए गए अपने संदेश में उन्होंने डॉ. मुखर्जी को भारत की एकता और अखंडता के लिए सर्वोच्च बलिदान देने वाला महान राष्ट्रवादी बताया. योगी ने कहा कि उनका योगदान हर भारतीय के मन में राष्ट्रप्रेम की भावना को सदैव प्रज्ज्वलित करता रहेगा. डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी का नाम भारतीय राजनीति के उन नेताओं में लिया जाता है जिन्होंने स्वतंत्र भारत की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. शिक्षा, प्रशासन और राजनीति जैसे विभिन्न क्षेत्रों में उन्होंने अपनी अलग पहचान बनाई. उनका जीवन संघर्ष, नेतृत्व और राष्ट्रहित के प्रति समर्पण का उदाहरण माना जाता है.
डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी के बलिदान दिवस पर CM योगी ने श्रद्धांजलि देते हुए उनके बलिदान को याद किया.
‘एक देश में दो विधान, दो प्रधान, दो निशान, नहीं चलेंगे’ के उद्घोषक, प्रखर राष्ट्रवादी और जनसंघ के संस्थापक अध्यक्ष डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी जी के बलिदान दिवस पर विनम्र श्रद्धांजलि।
— Yogi Adityanath (@myogiadityanath) June 23, 2026
भारत की एकता और अखंडता के लिए उनका सर्वोच्च बलिदान प्रत्येक देशवासी के हृदय में सदैव राष्ट्रवाद… pic.twitter.com/2D8U80KZ8V
6 जुलाई 1901 को एक प्रतिष्ठित परिवार में जन्मे डॉ. मुखर्जी ने कम उम्र में ही अपनी प्रतिभा का परिचय दे दिया था. कलकत्ता विश्वविद्यालय से शिक्षा प्राप्त करने के बाद वे सीनेट के फेलो बने और बाद में इंग्लैंड जाकर बैरिस्टर की उपाधि हासिल की. मात्र 33 वर्ष की आयु में वे कलकत्ता विश्वविद्यालय के कुलपति बने, जो उस समय एक बड़ी उपलब्धि मानी गई. उनके कार्यकाल में कई शैक्षणिक सुधार लागू किए गए.
डॉ. मुखर्जी ने अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत बंगाल विधान परिषद से की. बाद में वे विपक्ष के प्रमुख चेहरों में शामिल हुए और वित्त मंत्री के रूप में भी जिम्मेदारी संभाली. समय के साथ उन्होंने हिंदू महासभा में सक्रिय भूमिका निभाई और संगठन के राष्ट्रीय अध्यक्ष बने. उनकी स्पष्ट सोच और बेबाक नेतृत्व शैली ने उन्हें राष्ट्रीय राजनीति में अलग पहचान दिलाई.
स्वतंत्रता के बाद पंडित जवाहरलाल नेहरू की अंतरिम सरकार में उद्योग एवं आपूर्ति मंत्री के रूप में शामिल होने के बावजूद उन्होंने अपने सिद्धांतों से समझौता नहीं किया. दिल्ली समझौते के मुद्दे पर असहमति जताते हुए उन्होंने मंत्रिमंडल से इस्तीफा दे दिया. इसके बाद 21 अक्टूबर 1951 को उन्होंने भारतीय जनसंघ की स्थापना की और उसके पहले अध्यक्ष बने. यही संगठन आगे चलकर भारतीय जनता पार्टी की वैचारिक नींव बना.
डॉ. मुखर्जी ने जम्मू-कश्मीर में लागू विशेष व्यवस्था का खुलकर विरोध किया था. उनका प्रसिद्ध नारा 'एक देश में दो विधान, दो प्रधान और दो निशान नहीं चलेंगे' राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बना. वर्ष 1953 में कश्मीर जाने के दौरान उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया. 23 जून 1953 को हिरासत के दौरान उनका निधन हो गया. उनके निधन को भारतीय राजनीति की एक बड़ी क्षति माना जाता है और आज भी उन्हें राष्ट्र की एकता के लिए संघर्ष करने वाले नेता के रूप में याद किया जाता है.