Mayawati: सुप्रीम कोर्ट की 7 जजों की पीठ ने 1 अगस्त 2024 को एससी और एसटी के आरक्षण के संबंध में एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कोटे के अंदर कोटा देने के लिए राज्यों को स्वतंत्रता दी थी. हालांकि, इसके लिए कोर्ट ने कुछ शर्तें भी रखीं थी. इसे लेकर अलग-अलग राजनीतिक दलों ने प्रतिक्रिया दी. अब इस मामले में बसपा सुप्रीमो मायावती का भी बयान सामने आ गया है. उन्होंने कहा कि बसपा सर्वोच्च न्यायालय के फैसले से सहमत नहीं है.
उन्होंने सर्वोच्च न्यायालय के फैसले के पीछे सहमत न होने का तर्क भी दिया. मायावती ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर सुप्रीम कोर्ट के 2004 में दिए फैसले का भी जिक्र किया जिसमें उसने एससी/एसटी की वर्गीकरण की अनुमति नहीं दी थी.
मायावती ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट की 7 जजों की बेंच ने 1 अगस्त 2024 को एससी और एसटी के आरक्षण के संबंध में एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया. सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले में अन्य बातों के अलावा एससी और एसटी के उप-वर्गीकरण को मान्यता दी गई है, जिस पर हमारी पार्टी अपना असंतोष व्यक्त करती है.
#WATCH | BSP chief Mayawati says, "A 7 Judge bench of the Supreme Court, on 1 August 2024, gave an important verdict regarding the reservation of SC and ST. Sub-classification of SC and ST has been recognised in this verdict of the Supreme Court, among other things, with which… pic.twitter.com/MLObNTEXfC
— ANI (@ANI) August 4, 2024
उन्होंने आगे कहा कि इस संबंध में, देविंदर सिंह बनाम पंजाब राज्य मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले में, राज्य सरकारें उप-वर्गीकरण के नाम पर आरक्षित वर्गों की नई सूचियाँ बना सकेंगी, जिससे नए मुद्दे पैदा होंगे. सुप्रीम कोर्ट ने इस फैसले के माध्यम से, ईवी चिन्नैया बनाम आंध्र प्रदेश राज्य में 5 जजों की बेंच द्वारा 2004 में दिए गए अपने 20 साल पुराने फैसले को पलट दिया है, जिसमें एससी और एसटी के वर्गीकरण की अनुमति नहीं दी गई थी. और एससी और एसटी के उप-वर्गीकरण के बारे में भ्रम भी दूर किया है.
मायावती ने कहा- "इसके भीतर किसी भी प्रकार का वर्गीकरण करना उचित नहीं है. माननीय सुप्रीम कोर्ट ने अपने 2004 के फैसले में ये भी कहा था कि अनुसूचित जातियों और जनजातियों के भीतर किसी भी प्रकार का उप वर्गीकरण भारतीय संविधान के मूल भावना के विपरीत होगा."
उन्होंने आगे कहा- "माननीय सुप्रीम कोर्ट ने अपने 2004 के इस निर्णय के द्वारा समानता के अधिकार का उल्लंघन करने के कारण आंध्र प्रदेश सरकार द्वारा पारित आंध्र प्रदेश अनुसूचित जाति अधिनियम 2000 को भी रद्द कर दिया था."