मथुरा: ब्रज में होली केवल रंगों का उत्सव नहीं, बल्कि आस्था, परंपरा और भक्ति का जीवंत संगम है. फाल्गुन मास के शुक्ल पक्ष की नवमी पर विश्वविख्यात लठमार होली के अवसर पर बरसाना एक बार फिर कृष्ण-राधा की दिव्य लीलाओं का साक्षी बना. नंदगांव से श्रीकृष्ण के सखा स्वरूप हुरियारे, राधारानी के गांव बरसाना पहुंचे तो पूरा क्षेत्र अबीर-गुलाल और प्रेम के रंगों से सराबोर हो उठा.
नंदगांव के हुरियारे पारंपरिक वेशभूषा धोती, बगलबंदी और पीतांबरी में सुसज्जित होकर ढाल हाथ में लिए बरसाना के लिए रवाना हुए. प्रस्थान से पहले नंदभवन में श्रीकृष्ण और दाऊजी के विग्रह के समक्ष पदगान कर होली खेलने का आमंत्रण दिया गया. नंदीश्वर महादेव से भी अलौकिक होली के साक्षी बनने का आग्रह किया गया. इसके बाद ‘चलौ बरसाने में खेलें होरी’ जैसे रसिया गाते हुए हुरियारे आनंदघन चौपाल से पताका लेकर पैदल ही बरसाना धाम की ओर बढ़ चले.
बरसाना पहुंचने पर हुरियारों का स्वागत प्रिया कुंड पर हुआ. यहां से वे टोलियों में रंगीली गली की ओर बढ़े, जहां सजी-धजी हुरियारिनें उनकी प्रतीक्षा कर रही थीं. परंपरा के अनुसार पहले वाद-संवाद हुआ, जिसमें प्रेमरस से भरी हंसी-ठिठोली ने माहौल को और उल्लासपूर्ण बना दिया. देखते ही देखते यह संवाद तनातनी में बदल गया और हुरियारिनों की लाठियां बरसने लगीं. हुरियारे ढाल से बचाव करते हुए होली के गीत गाते रहे. लाठियों की थाप और अबीर-गुलाल की वर्षा के बीच रंगीली गली पूरी तरह रंगों में डूब गई.
श्रीजी मंदिर से लेकर बरसाना की गलियों तक भक्ति और उल्लास का अद्भुत संगम देखने को मिला. मान्यता है कि बरसाना की महिलाओं की लाठी जिसके सिर को स्पर्श कर जाए, वह सौभाग्यशाली माना जाता है. यही कारण है कि इस अनोखी होली को देखने और इसमें शामिल होने के लिए देश-विदेश से हजारों श्रद्धालु बरसाना पहुंचे. सुबह से ही श्रद्धालुओं ने गलियों और मंदिर परिसर में डेरा डाल लिया था. हर कोई इस अलौकिक लीला का साक्षी बनने को उत्सुक नजर आया.
लठमार होली की तैयारियां एक माह पूर्व से ही शुरू हो जाती हैं. इससे एक दिन पहले बरसाना में लड्डू होली खेली गई, जिसमें श्रद्धालुओं ने प्रसाद स्वरूप लड्डुओं की वर्षा का आनंद लिया. शुक्रवार को आयोजित लठमार होली ने उत्सव को चरम पर पहुंचा दिया. प्रशासन की ओर से सुरक्षा के व्यापक इंतजाम किए गए थे, जिससे आयोजन शांतिपूर्ण ढंग से संपन्न हुआ.
ब्रज की यह परंपरा केवल उत्सव नहीं, बल्कि राधा-कृष्ण के अनन्य प्रेम का प्रतीक है. लठमार होली में जहां एक ओर हंसी-ठिठोली और रंगों की बौछार है, वहीं दूसरी ओर सदियों पुरानी आस्था और सांस्कृतिक विरासत की झलक भी मिलती है. बरसाना की पावन धरा पर सजी यह दिव्य होली एक बार फिर दुनिया को भारतीय संस्कृति के अनुपम और जीवंत रंगों से परिचित करा गई.