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2022 में मुंह की खाने के बाद 2024 में कैसे बदलेगी हवा, क्या कांग्रेस के कंधे पर यूपी भेद पाएगी सपा?

Lok Sabha elections 2024: आगामी लोकसभा चुनावों को लेकर सत्ता और विपक्ष दोनों ही यूपी को साधने में लगा हुआ है जिसको लेकर सपा ने छोटी पार्टियों को छोड़ कांग्रेस के साथ गठबंधन किया है. ऐसे में सवाल यह उठ रहा है कि ये फैसला उसके लिए कितना फायदेमंद होगा.

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Vineet Kumar

Lok Sabha elections 2024: 2024 के आम चुनावों की तैयारियां जोरों पर हैं और सभी की नजर इस समय सरकार बनाने में सबसे अहम भूमिका निभाने वाले राज्य उत्तर प्रदेश पर है. जहां एक ओर एनडीए गठबंधन मजबूत नजर आ रहा है तो वहीं पर सपा-कांग्रेस का इंडिया गठबंधन चुनौती देने की तैयारी कर रहा है. हालांकि इस लड़ाई में मायावती की बसपा और पीडीएम गठबंधन (अपना दल और एआईएमआईएम) खेल कर सकती है. ऐसे में क्या सपा यूपी के किले को भेद पाने में कामयाब होगी या फिर 2022 विधानसभा चुनावों की तरह फिर से मुंह की खानी पड़ेगी.

समाजवादी पार्टी ने 2022 के विधानसभा चुनावों में ओबीसी वोटर्स को प्रभावित करने के लिए राष्ट्रीय लोक दल (आरएलडी), सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी (एसबीएसपी), जनवादी सोशलिस्ट पार्टी (जिसे अब जन जनवादी पार्टी कहा जाता है) अपना दल (कमेरावादी), और महान दल के साथ गठबंधन किया था.

जानें कैसा रहा दो विधानसभा चुनावों में प्रदर्शन

विधानसभा चुनावों में राज्य की 403 सीटों में से, एसपी ने 32% वोट शेयर के साथ 111 सीटें जीतीं, जबकि आरएलडी को 8 और एसबीएसपी को 6 सीटें मिलीं. वहीं गठबंधन में शामिल बाकी दलों को कोई सीट नहीं मिली. 

दूसरी ओर बीजेपी ने 255 सीटें और 41.29% वोट शेयर के साथ चुनाव अपने नाम किया. 2017 के विधानसभा चुनावों में, जब समाजवादी पार्टी ने इन पार्टियों के बजाय सिर्फ कांग्रेस के साथ गठबंधन किया था, तो सपा ने 21.82% वोटों के साथ 47 सीटें जीती थीं, जबकि कांग्रेस को 7 सीटें मिली थीं. वहीं बीजेपी ने 39.67% वोटों के साथ 312 सीटों पर जीत हासिल की थी. दोनों विधानसभा चुनावों के नतीजे पर बात करें तो सपा ने अपने गठबंधन में 64 सीटें और करीब 10 प्रतिशत वोटों की बढ़ोतरी हासिल की.

2022 के बाद कैसे टूटता रहा सपा का गठबंधन

हालांकि आगामी लोकसभा चुनाव से पहले समाजवादी पार्टी को बड़ा झटका तब लगा है जब पश्चिमी यूपी में जाटों के बीच मजबूत पकड़ रखने वाली जयंत चौधरी की अगुवाई वाली आरएलडी ने बीजेपी के नेतृत्व वाले एनडीए गठबंधन का दामन थाम लिया. सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी (एसबीएसपी) पिछले साल ही एनडीए में शामिल हुई थी. 2022 के विधानसभा चुनावों के ठीक बाद से ही एसबीएसपी अध्यक्ष ओम प्रकाश राजभर ने सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव की आलोचना शुरू कर दी थी और 2022 के राष्ट्रपति चुनाव में उनकी पार्टी के विधायकों ने क्रॉस वोटिंग करते हुए एनडीए के उम्मीदवार द्रौपदी मुर्मू का समर्थन किया था.

इस बीच, दिवंगत कुर्मी नेता सोनेलाल पटेल द्वारा स्थापित अपना दल से अलग हुए समूह जन जनवादी पार्टी और अपना दल (के) ने भी सीट बंटवारे पर बातचीत विफल होने के बाद लोकसभा चुनाव अकेले लड़ने का फैसला करते हुए सपा से नाता तोड़ लिया. हालांकि अपना दल (के) ने ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (एआईएमआईएम) के साथ पीडीएम गठबंधन कर लिया है.

इस वजह से अपना दल ने छोड़ा साथ

अपना दल पार्टी की सीनियर नेता पल्लवी पटेल, जो 2022 में सपा के टिकट पर सिराथू से विधायक चुनी गईं वो इस गठबंधन के टूटने का जिम्मेदार सपा के "विश्वासघात" को ठहराती हैं. उनका दावा है कि सपा ने खुद घोषणा की थी कि कोई गठबंधन नहीं होगा.

दरअसल, अपना दल (के) अध्यक्ष कृष्णा पटेल ने 20 मार्च को घोषणा की थी कि पार्टी भारत गठबंधन के हिस्से के रूप में तीन लोकसभा सीटों - फूलपुर, मिर्जापुर और कौशांबी - पर चुनाव लड़ेगी. एक दिन बाद, अखिलेश ने संगठन के साथ अपनी पार्टी के गठबंधन के अंत का संकेत देते हुए कहा था कि उनका गठबंधन 2022 के विधानसभा चुनावों के लिए है, न कि 2024 के लोकसभा चुनावों के लिए. ऐसे में सवाल यह खड़ा हो रहा है कि क्या सपा का कांग्रेस के साथ गठबंधन सेल्फ गोल साबित होगा या फिर लोकसभा चुनावों में इसका असर नहीं पड़ेगा.

बीजेपी नहीं छोटी पार्टियों के खिलाफ लड़ रही है सपा

इस मामले पर सपा प्रवक्ता राजेंद्र चौधरी का मानना है कि ये छोटी पार्टियां हैं उनके पास कोई आधार नहीं है और उसके बावजूद हर पार्टी 3 से 5 लोकसभा सीटों पर लड़ने की मांग कर रही थी. हमारी पार्टी के लिए ये कर पाना संभव नहीं है. ये पार्टियां अपने स्वार्थ के लिए गठबंधन में आती है और काम पूरा होने पर चली जाती हैं. हमारे लिए उनका न होना कोई मायने नहीं रखता है.

वहीं 2022 में गठबंधन का हिस्सा रही जन जनवादी पार्टी ने 30 लोकसभा सीटों पर अकेले चुनाव लड़ने का फैसला किया है और पहले ही पूर्वी यूपी की 14 सीटों पर उम्मीदवारों की घोषणा कर चुकी है, जिसमें आजमगढ़ भी शामिल है जहां से अखिलेश के चचेरे भाई धर्मेंद्र यादव चुनाव लड़ रहे हैं. जन जनवादी पार्टी के अध्यक्ष संजय चौहान घोसी से चुनाव लड़ेंगे. सपा इस सीट से पार्टी के वरिष्ठ नेता राजीव राय को मैदान में उतारने की इच्छुक थी.

गठबंधन से अलग होने पर संजय चौहान ने कहा,'घोसी में चौहान समुदाय के लोगों का वर्चस्व है. लेकिन सपा ने वहां दूसरा उम्मीदवार उतार दिया. एसपी ने मुझसे कोई दूसरी सीट तलाशने की बात कही. सपा छोटी पार्टियों से नाता तोड़कर बीजेपी को मौका दे रही है. वह (अखिलेश) बीजेपी से नहीं बल्कि हमसे लड़ रहे हैं. वह पीडीए के नेताओं - पिछड़े दलित अल्पसंख्याक (पिछड़े, दलित और अल्पसंख्यक) को साथ नहीं ले रहे हैं, जो लोकसभा चुनावों में सपा का मुख्य नारा है.'

महान दल को नहीं मिला किसी का समर्थन

उल्लेखनीय है कि 2019 के लोकसभा चुनाव में चौहान की पार्टी ने सपा के साथ गठबंधन किया था, जब उन्होंने चंदौली से सपा के चुनाव चिन्ह पर चुनाव लड़ा था. वह 13,959 वोटों के मामूली अंतर से चुनाव हार गए थे. इनके अलावा महान दल के अध्यक्ष केशव देव मौर्य ने सपा से दो सीटों की मांग की थी. महान दल का आधार शाक्य, सैनी, कुशवाह और मौर्य जैसे ओबीसी समूहों के बीच मजबूत है लेकिन सपा ने उनकी मांग को भी अस्वीकार कर दिया था. इसके बाद महान दल ने बीएसपी के साथ गठबंधन के लिए संपर्क किया और जब उन्होंने भी सीटें देने से इंकार किया तो मौर्य ने फैसला किया कि उनकी पार्टी उन सीटों पर सपा का समर्थन करेगी जहां वह चुनाव लड़ रही है.

उन्होंने कहा, 'मैं केवल 2 सीटों की मांग कर रहा था. दोनों (सपा और बसपा) ने मेरे साथ सीटें साझा नहीं कीं. चूंकि हमारा अखिलेश जी के साथ पहले गठबंधन था, इसलिए हम उनका समर्थन करेंगे. लेकिन जहां कांग्रेस चुनाव लड़ रही है वहां हम बसपा का समर्थन करेंगे. '

2009 और 2014 के लोकसभा चुनाव में महान दल ने कांग्रेस के साथ गठबंधन किया था. उनके बीच 2019 के चुनाव को लेकर बातचीत हुई थी, लेकिन गठबंधन पर बात नहीं बन पाई. तब महान दल ने बीजेपी को समर्थन दिया था. 

एएसपी से भी नहीं बनी सपा की बात

इस बीच, भीम आर्मी प्रमुख चन्द्रशेखर आजाद के नेतृत्व वाली आजाद समाज पार्टी (एएसपी-कांशीराम) के साथ समाजवादी पार्टी की बात नहीं बन पाई और इसी वजह से एएसपी अब यूपी में अकेले चुनाव लड़ रही है.

दिसंबर 2022 के विधानसभा उपचुनाव में सपा, आरएलडी और एएसपी ने खतौली और रामपुर सीटों पर मिलकर चुनाव लड़ा था. यह उनके गठबंधन की ताकत है कि वो खतौली को बीजेपी से छीनने में सक्षम थे, क्योंकि निर्वाचन क्षेत्र में बड़ी संख्या में दलित वोटर्स आजाद के पक्ष में थे. पश्चिमी यूपी में दलितों पर खासा प्रभाव रखने वाले आजाद ने खुद चुनाव लड़ने के लिए एसपी से नगीना (एससी-आरक्षित) सीट की मांग की थी, लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ. 

इसको लेकर एएसपी नेता कांशीराम ने कहा कि सपा ने हमें नगीना के बजाय आगरा और बुलंदशहर की पेशकश की. हम सहमत नहीं हुए और अकेले चुनाव लड़ने का फैसला किया. वहीं समाजवादी पार्टी के प्रवक्ता राजेंद्र चौधरी ने कहा कि चंद्रशेखर आजाद को सीट देने को लेकर पार्टी में कोई चर्चा नहीं हुई. वह जयंत चौधरी (आरएलडी अध्यक्ष) के साथ ही रहते थे. उनका सपा से कोई लेना-देना नहीं है.