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India Daily

'गंगा में चिकन बिरयानी खाने पर कोई कानून नहीं', वाराणसी मामले पर जस्टिस भुइयां की टिप्पणी से छिड़ी नई बहस

सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस उज्जवल भुइयां ने कहा कि गंगा में चिकन बिरयानी खाना अपने आप में अपराध नहीं है. उन्होंने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और शांतिपूर्ण विरोध के अधिकार पर भी चिंता जताई.

Sagar
Edited By: Sagar Bhardwaj
'गंगा में चिकन बिरयानी खाने पर कोई कानून नहीं', वाराणसी मामले पर जस्टिस भुइयां की टिप्पणी से छिड़ी नई बहस
Courtesy: Supreme Court of India

वाराणसी में गंगा नदी के बीच नाव पर इफ्तार के दौरान चिकन बिरयानी खाने को लेकर दर्ज हुए चर्चित मामले पर सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश जस्टिस उज्जवल भुइयां ने महत्वपूर्ण टिप्पणी की है. उन्होंने कहा कि गंगा नदी में चिकन खाना अपने आप में कोई अपराध नहीं है और केवल इस आधार पर किसी व्यक्ति को जेल भेजना उचित नहीं माना जा सकता. उनकी यह टिप्पणी ऐसे समय आई है जब यह मामला पहले से ही सामाजिक और कानूनी बहस का विषय बना हुआ है.

लेक्चर के दौरान रखा अपना पक्ष

भोपाल स्थित एक विश्वविद्यालय में आयोजित व्याख्यान के दौरान जस्टिस भुइयां ने इस मामले का उल्लेख करते हुए कहा कि किसी व्यक्ति के भोजन के आधार पर उसे अपराधी नहीं ठहराया जा सकता. उन्होंने कहा कि यदि किसी ने भोजन का बचा हुआ हिस्सा नदी में फेंका है तो वह पर्यावरण और स्वच्छता से जुड़ा अलग मुद्दा हो सकता है, लेकिन केवल चिकन बिरयानी खाना कानून की नजर में अपराध नहीं बन जाता. उन्होंने यह भी कहा कि इस मामले में गिरफ्तार किए गए लोगों को लंबे समय तक जेल में रहना पड़ा.

क्या था पूरा विवाद?

यह मामला उस समय सामने आया था जब इफ्तार के दौरान गंगा नदी में नाव पर मौजूद 14 मुस्लिम युवाओं के चिकन बिरयानी खाने और कथित रूप से हड्डियां नदी में फेंकने का आरोप लगा. इसके बाद पुलिस ने उनके खिलाफ धार्मिक भावनाएं आहत करने और गंगा नदी को प्रदूषित करने सहित विभिन्न धाराओं में मामला दर्ज किया था. घटना के वीडियो और तस्वीरें सोशल मीडिया पर वायरल होने के बाद यह मुद्दा व्यापक चर्चा में आ गया था.

अभिव्यक्ति की आजादी पर भी जताई चिंता

अपने संबोधन में जस्टिस भुइयां ने कहा कि लोकतंत्र की मजबूती बहस, असहमति और शांतिपूर्ण विरोध के अधिकार पर निर्भर करती है. उन्होंने चिंता जताई कि आज कई सामान्य गतिविधियों को भी अपराध के रूप में देखा जाने लगा है. उनके अनुसार शांतिपूर्ण विरोध करना प्रत्येक नागरिक का मौलिक अधिकार है और इसे संदेह की दृष्टि से नहीं देखा जाना चाहिए.

छात्रों और सामाजिक कार्यकर्ताओं का भी किया जिक्र

जस्टिस भुइयां ने कहा कि पर्यावरण संरक्षण जैसे मुद्दों पर आवाज उठाने वाले सामाजिक कार्यकर्ताओं और विश्वविद्यालय परिसरों में विरोध प्रदर्शन करने वाले छात्रों के साथ कई बार अपराधियों जैसा व्यवहार किया जाता है. उन्होंने कहा कि कई मामलों में छात्रों को लंबे समय तक जमानत नहीं मिलती और उन्हें निलंबन जैसी कार्रवाई का भी सामना करना पड़ता है. उनके इस बयान ने कानून, नागरिक अधिकारों और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को लेकर नई बहस को जन्म दे दिया है.