उत्तर प्रदेश की राजनीति में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने वाराणसी से एक बड़ा राजनीतिक संदेश दिया है. संत रविदास जयंती कार्यक्रम में उन्होंने भदोही जिले का नाम दोबारा संत रविदास नगर करने का ऐलान किया. इस फैसले को केवल प्रशासनिक बदलाव नहीं, बल्कि दलित समाज के बीच राजनीतिक और सामाजिक संदेश के रूप में देखा जा रहा है.
वाराणसी में आयोजित कार्यक्रम में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कहा कि समाजवादी पार्टी की सरकार ने संत रविदास के नाम पर बने जिले का नाम बदलकर ऐतिहासिक भूल की थी. उन्होंने घोषणा की कि अब भदोही को फिर से संत रविदास नगर के नाम से जाना जाएगा. मुख्यमंत्री ने अपने संबोधन में यह भी कहा कि उनकी सरकार महापुरुषों के सम्मान और उनकी विरासत को संरक्षित करने के लिए प्रतिबद्ध है. उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि पूर्ववर्ती सरकारों ने दलित महापुरुषों के नाम से जुड़े कई संस्थानों और जिलों के नाम बदलकर सामाजिक भावनाओं को आहत किया था.
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह फैसला दलित समाज, खासकर रविदासिया समुदाय को साधने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है. उत्तर प्रदेश के अलावा पंजाब, हरियाणा, दिल्ली, मध्य प्रदेश और हिमाचल प्रदेश में भी संत रविदास के अनुयायियों की बड़ी संख्या है. लंबे समय तक यह वर्ग कांग्रेस और बहुजन समाज पार्टी का मजबूत समर्थक माना जाता रहा है. ऐसे में भाजपा का यह कदम 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले सामाजिक समीकरणों को प्रभावित करने वाला माना जा रहा है.
भदोही का नाम बदलने का मुद्दा पहले भी उत्तर प्रदेश की राजनीति का हिस्सा रहा है. बसपा सरकार के दौरान संत रविदास नगर नाम दिया गया था, जिसे 2012 में समाजवादी पार्टी सरकार ने बदलकर भदोही कर दिया. तब से बसपा और भाजपा लगातार इस फैसले को लेकर समाजवादी पार्टी पर निशाना साधती रही हैं. मुख्यमंत्री योगी ने अपने संबोधन में कन्नौज मेडिकल कॉलेज सहित दलित महापुरुषों के नाम से जुड़े अन्य मामलों का भी उल्लेख करते हुए विपक्ष पर तीखा हमला बोला.
मुख्यमंत्री के इस ऐलान के बाद प्रदेश की राजनीति में नई हलचल तेज हो गई है. भाजपा अब इस फैसले को दलित सम्मान और सामाजिक न्याय से जोड़कर व्यापक स्तर पर प्रचारित करने की तैयारी में है. वहीं विपक्ष के सामने इस मुद्दे पर अपनी राजनीतिक रणनीति तय करने की चुनौती होगी. आने वाले समय में यह स्पष्ट होगा कि संत रविदास नगर नाम बहाल करने का निर्णय भाजपा को दलित वोट बैंक में कितना राजनीतिक लाभ दिला पाता है और 2027 के चुनावी समीकरणों पर इसका कितना प्रभाव पड़ता है.