अयोध्या: अयोध्या में इस बार सावन का झूलनोत्सव कई मायनों में बेहद खास होने जा रहा है. श्रीराम जन्मभूमि मंदिर में रामलला के झूलनोत्सव की परंपरा करीब 498 साल बाद नए स्वरूप में दिखाई देगी.
भव्य राम मंदिर के निर्माण के बाद पहली बार झूलनोत्सव की शुरुआत सावन शुक्ल पंचमी के बजाय सावन शुक्ल तृतीया से किए जाने की तैयारी है. इस दौरान रामलला विशेष रूप से तैयार किए गए स्वर्ण झूले पर विराजमान होंगे और श्रद्धालुओं को दिव्य झूला दर्शन का अवसर मिलेगा.
अयोध्या में सावन शुरू होते ही मंदिरों में झूलनोत्सव की तैयारियां शुरू हो जाती हैं. भगवान राम के बाल स्वरूप को झूले पर विराजमान कर झुलाने की यह परंपरा रामनगरी की धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान का अहम हिस्सा रही है. लंबे समय तक रामलला टेंट में विराजमान रहे, इसलिए झूलनोत्सव की रस्म लकड़ी के झूले पर सीमित स्तर पर पूरी होती थी. अब भव्य मंदिर में रामलला के विराजमान होने के बाद इस परंपरा को नए और भव्य स्वरूप में आगे बढ़ाया जा रहा है.
इस बार रामलला को गर्भगृह में विशेष रूप से तैयार किए गए स्वर्ण झूले पर विराजमान कराया जाएगा. श्रद्धालुओं के लिए झूला दर्शन की विशेष व्यवस्था की जाएगी. जानकारी के अनुसार भक्त करीब 20 फीट की दूरी से रामलला के दिव्य झूला दर्शन कर सकेंगे. स्वर्ण झूले पर बाल स्वरूप में रामलला का दर्शन भक्तों के लिए आकर्षण का प्रमुख केंद्र रहेगा.
रामनगरी में पारंपरिक झूलनोत्सव और सावन मेले का आयोजन 15 अगस्त से 26 अगस्त तक किए जाने की तैयारी है. इसकी शुरुआत मणि पर्वत से होगी. सावन के दौरान मणि पर्वत पर भगवान के विग्रहों को झूले पर विराजमान कराने और भक्तों को दर्शन कराने की परंपरा लंबे समय से चली आ रही है.
झूलनोत्सव सावन में भगवान राम के बाल स्वरूप को हिंडोले पर विराजमान कर उन्हें झूला झुलाने की भक्तिमय परंपरा है. इस दौरान झूले को फूलों और अन्य सजावटी सामग्री से सजाया जाता है. मंदिरों में भजन, आरती, भोग और धार्मिक अनुष्ठान होते हैं. कई स्थानों पर भगवान की पालकी यात्रा भी निकाली जाती है.
इस बार झूलनोत्सव का आयोजन केवल मुख्य मंदिर तक सीमित नहीं रहेगा. श्रीराम जन्मभूमि मंदिर परिसर में स्थित पूरक मंदिरों में भी विशेष पूजा, आरती, भोग और अन्य धार्मिक कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे. इससे पूरे परिसर में सावन के उत्सव का धार्मिक और भक्तिमय वातावरण देखने को मिलेगा.