जयपुर अग्निकांड ने खोह नागोरियान की तंग गलियों में मंगलवार की सुबह ऐसी तबाही मचाई जिसकी गूंज हर दिल को हिला गई. अवैध पटाखा फैक्ट्री में हुए इस भीषण धमाके में आठ लोगों की जान चली गई और पीछे छूट गए टूटे हुए परिवार, बिलखती मांएं और अनगिनत अनकहे सवाल. यह हादसा सिर्फ आग और धुएँ की कहानी नहीं है, बल्कि उन घरों की कहानी है जहाँ अब कोई कभी लौटकर नहीं आएगा.
सोलह वर्षीय मोहम्मद रब्बिल उस सुबह घर से निकला था तो बस गोदाम में काम करने वाले लोगों को पानी की दो बोतलें पहुंचाने के लिए. उसकी माँ नाजमीन बानो अब भी दरवाजे पर निगाहें जमाए बैठी हैं. रुंधे हुए गले से वे बस यही कहती हैं कि उनके बेटे का कोई कसूर नहीं था, वह तो बस किसी की प्यास बुझाने गया था.
रब्बिल के पिता सिकंदर कुरैशी लंबे समय से गंभीर रोग से पीड़ित हैं और उन्हें नियमित रूप से रक्त चढ़ाने की जरूरत पड़ती है. परिवार पहले से ही आर्थिक तंगी में जी रहा था. रब्बिल तीन भाई बहनों में सबसे बड़ा था और घर की उम्मीद बनने की उम्र में ही वह इस दुनिया को अलविदा कह गया. नानी कहती हैं कि उन्होंने उसे अपने बच्चे की तरह पाला था और अब लगता है कि वह अभी आवाज लगाएगा.
जयपुर पटाखा फैक्ट्री हादसे ने एक मां की गोद से दो बेटे छीन लिए. अठारह वर्षीय आजीम पिछले दो वर्षों से उसी फैक्ट्री में काम करता था जबकि तीस वर्षीय बिलाल सिलाई का काम करता था और उस दिन केवल अपने छोटे भाई से मिलने पहुँचा था. दोनों भाई आपस में बातें कर रहे थे कि अचानक जोरदार धमाका हुआ और आग की लपटों ने उन्हें घेर लिया. बिलाल अपने पीछे पत्नी और तीन साल और एक साल की दो मासूम बेटियाँ छोड़ गया है.
अठारह साल के आजीम के घर में उसके विवाह की बातें शुरू हो ही चुकी थीं. परिवार सेहरा बंधवाने का सपना देख रहा था, लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था. एसएमएस अस्पताल की शवगृह में दोनों भाइयों के शव देखकर छोटे भाई राशिद खान की आंखों में जो दर्द था, वह किसी भी शब्द में बयान नहीं किया जा सकता.
बीस वर्षीय समीर खान और आजीम की दोस्ती पूरे मोहल्ले में जानी जाती थी. दोनों बचपन से साथ खेले, साथ बड़े हुए और एक ही फैक्ट्री में काम करने लगे. धमाके में दोनों बुरी तरह झुलस गए. अस्पताल में डॉक्टर उन्हें बचाने के हर संभव प्रयास करते रहे, लेकिन कुछ ही मिनटों के अंतराल में दोनों ने अंतिम साँस ली.
खोह नागोरियान हादसे के बाद पूरी बस्ती में एक ही सवाल गूंज रहा है. यदि रिहायशी इलाके में यह अवैध पटाखा फैक्ट्री न चल रही होती तो क्या ये आठ जिंदगियाँ बच सकती थीं. जयपुर विस्फोट की जाँच भले ही शुरू हो गई हो, लेकिन इन परिवारों के लिए न कोई जाँच रिपोर्ट काम आएगी और न कोई सरकारी घोषणा. उनके लिए तो बस वे चेहरे हैं जो अब कभी नहीं दिखेंगे.