पंजाब में नशे के खिलाफ चलाया जा रहा ‘युद्ध नशों विरुद्ध’ अभियान अब असर दिखाने लगा है. सरकार का कहना है कि नशे की समस्या से निपटने के लिए केवल कानूनी कार्रवाई ही नहीं, बल्कि समय पर इलाज, परिवार का सहयोग और समाज की भागीदारी भी उतनी ही जरूरी है.
1 मार्च 2025 को शुरू हुई ‘युद्ध नशों विरुद्ध’ मुहिम पंजाब सरकार की सबसे बड़ी सामाजिक पहलों में से एक बन चुकी है. स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्री डॉ. बलबीर सिंह के अनुसार मार्च 2025 से मई 2026 तक राज्य के नशामुक्ति केंद्रों और ओपिओइड असिस्टेड ट्रीटमेंट केंद्रों में 90 हजार से अधिक लोगों का इलाज किया गया. यह आंकड़ा दिखाता है कि सरकार नशे से प्रभावित लोगों को सिर्फ अपराधी नहीं मान रही, बल्कि उन्हें सामान्य जीवन में लौटाने का प्रयास भी कर रही है. सरकार का उद्देश्य प्रभावित लोगों को नया अवसर देना और उन्हें समाज की मुख्यधारा से जोड़ना है.
विशेषज्ञों का मानना है कि नशे की शुरुआत अक्सर छोटे संकेतों से होती है, जिन्हें परिवार और समाज समय रहते पहचान सकते हैं. बच्चों या युवाओं के व्यवहार में अचानक बदलाव, चिड़चिड़ापन, पढ़ाई में रुचि कम होना, बार-बार पैसों की मांग करना या परिवार से दूरी बनाना ऐसे संकेत हो सकते हैं जिन्हें नजरअंदाज नहीं करना चाहिए. इसी तरह लगातार थकान, नींद की समस्या, आंखों का लाल होना और वजन में बदलाव भी चेतावनी के संकेत माने जाते हैं. विशेषज्ञों ने अभिभावकों को सलाह दी है कि वे बच्चों से खुलकर बात करें और जरूरत पड़ने पर डॉक्टर या काउंसलर की मदद लें.
अभियान के तहत इलाज करा चुके कई लोगों ने अपनी जिंदगी में सकारात्मक बदलाव महसूस किया है. अमृतसर के मनप्रीत सिंह और तरनतारन के खुशबाज सिंह जैसे लोगों ने बताया कि सरकारी नशामुक्ति केंद्रों ने उन्हें नई शुरुआत का मौका दिया. काउंसलिंग, चिकित्सा और सहयोगी माहौल की मदद से वे अब सामान्य जीवन की ओर लौट रहे हैं. सरकार का कहना है कि नशे के खिलाफ लड़ाई तीन स्तंभों पर आधारित है, नशामुक्ति, पुनर्वास और काउंसलिंग. प्रशासन का मानना है कि जब परिवार, स्कूल, स्वास्थ्य विशेषज्ञ और समाज मिलकर काम करेंगे, तभी पंजाब को नशे की समस्या से स्थायी राहत मिल सकेगी.