मध्य प्रदेश में 18 जून को होने वाले राज्यसभा चुनाव से पहले राजनीतिक गतिविधियां तेज हो गई हैं. भारतीय जनता पार्टी द्वारा मध्य प्रदेश मछुआरा कल्याण बोर्ड के अध्यक्ष महेश केवट को तीसरे उम्मीदवार के रूप में मैदान में उतारने के बाद चुनावी मुकाबला और रोचक हो गया है.
भाजपा के इस कदम ने कांग्रेस की चिंताएं बढ़ा दी हैं और पार्टी अब अपने विधायकों को एकजुट रखने की रणनीति पर काम कर रही है. राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि राज्यसभा चुनाव से पहले प्रदेश में एक बार फिर रिसॉर्ट पॉलिटिक्स देखने को मिल सकती है.
भाजपा की चुनावी रणनीति सामने आने के बाद कांग्रेस नेतृत्व सक्रिय हो गया है. सूत्रों के अनुसार, पार्टी अपने विधायकों को कुछ दिनों के लिए कांग्रेस शासित राज्य में भेजने पर विचार कर रही है. इसका उद्देश्य विधायकों को एकजुट रखना और किसी भी तरह की टूट-फूट या क्रॉस वोटिंग की संभावना को कम करना है. बताया जा रहा है कि कर्नाटक इस योजना के लिए सबसे मजबूत विकल्प के रूप में उभरकर सामने आया है. कांग्रेस नेताओं का मानना है कि विधायकों को चुनाव तक एक साथ रखने से पार्टी अनुशासन बनाए रखने में मदद मिलेगी.
राज्यसभा चुनाव की पूरी तस्वीर विधानसभा के आंकड़ों पर निर्भर करती है. वर्तमान में मध्य प्रदेश विधानसभा में कुल 229 सदस्य हैं. राज्यसभा के लिए किसी उम्मीदवार को जीत दर्ज करने के लिए पहली पसंद के 58 मतों की आवश्यकता होगी. भाजपा के पास विधानसभा में 164 विधायक हैं. इस संख्या के आधार पर पार्टी आसानी से दो सीटें जीत सकती है. राजनीतिक समीकरणों के अनुसार, भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव तरुण चुघ और प्रदेश इकाई के सचिव रजनीश अग्रवाल का राज्यसभा पहुंचना लगभग तय माना जा रहा है. हालांकि असली मुकाबला तीसरी सीट को लेकर है.
भाजपा ने महेश केवट को उम्मीदवार बनाकर स्पष्ट संकेत दिया है कि वह तीसरी सीट पर भी जीत हासिल करने की कोशिश करेगी. इसके लिए पार्टी को अतिरिक्त मतों की आवश्यकता होगी, जिससे चुनावी गणित और दिलचस्प हो गया है. भाजपा की रणनीति के जवाब में कांग्रेस ने पूर्व सांसद मीनाक्षी नटराजन को अपना उम्मीदवार बनाया है. पार्टी नेतृत्व का मानना है कि उनकी राजनीतिक पहचान और अनुभव कांग्रेस के पक्ष में माहौल बनाने में मदद करेगा.