मध्य प्रदेश हाईकोर्ट में एक चौंकाने वाली घटना ने सबको स्तब्ध कर दिया है, जब याचिकाकर्ता दयाशंकर पांडे ने अपनी पत्नी के गर्भपात से हुए मृत भ्रूण को कोर्टरूम में लाकर जज के सामने रख दिया. यह सब 200 करोड़ रुपये के कथित घोटाले और परिवार पर हमलों से जुड़ी याचिका के दौरान हुआ. अदालत ने न केवल याचिका ठुकरा दी, बल्कि इस हरकत की कड़ी निंदा की और कहा कि न्यायालय भावनाओं या नाटक का मंच नहीं है. न्याय सिर्फ कानून और सबूतों पर आधारित होता है.
दयाशंकर पांडे ने दावा किया कि उन्होंने मारुति सुजुकी कंपनी में 200 करोड़ रुपये से ज्यादा के कथित गबन का पर्दाफाश किया था. इसी वजह से उन पर और परिवार पर कई बार हमले हुए. उन्होंने बताया कि एक हमले में उनकी पत्नी को चोटें आईं, जिससे गर्भपात हो गया. बेटी को भी पहले आग से झुलसने के कारण स्थायी अक्षमता हुई. वे 200 करोड़ की राशि, बेटी के इलाज के 82 लाख रुपये और निष्पक्ष जांच की मांग कर रहे थे.
सुनवाई के दौरान पिछले सोमवार (9 मार्च) को पांडे ने मृत भ्रूण को कोर्ट में लाकर जज की डाइस के सामने रख दिया. उनका मकसद कोर्ट से सहानुभूति बटोरना और न्याय दिलवाना था. अदालत ने इसे बेहद आपत्तिजनक और गैरकानूनी करार दिया. कहा गया कि इससे न्यायालय की गरिमा और शालीनता को ठेस पहुंचती है. भ्रूण को इस तरह रखना बायोमेडिकल वेस्ट नियमों का भी उल्लंघन है.
राज्य सरकार और मारुति सुजुकी ने याचिका का विरोध किया. उन्होंने कहा कि आरोप पूरी तरह बेबुनियाद हैं और कोई दस्तावेज नहीं दिए गए. अदालत ने रिकॉर्ड देखने के बाद पाया कि याचिकाकर्ता ने शिकायतों की कॉपियां तक नहीं जमा कीं. याचिका को अस्पष्ट, बिना आधार और अच्छे इरादे से रहित बताया गया. ऐसे गंभीर आरोप बिना ठोस सामग्री के नहीं सुने जा सकते.
अदालत ने देखा कि पांडे पहले भी इसी मुद्दे पर कई बार हाईकोर्ट आए हैं, लेकिन उचित कानूनी रास्ता नहीं अपनाया. नई कोई सामग्री नहीं दी गई. इसे न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग और कोर्ट के समय की बर्बादी माना गया. ऐसी दोहराई जाने वाली याचिकाएं परेशान करने वाली साबित होती हैं. जज ने परिवार की किसी भी व्यक्तिगत पीड़ा पर सहानुभूति जताई, लेकिन स्पष्ट किया कि भावनाएं न्यायिक फैसलों को प्रभावित नहीं कर सकतीं. अगर पुलिस कार्रवाई नहीं कर रही, तो मजिस्ट्रेट के पास जाना चाहिए, न कि सीधे हाईकोर्ट में रिट याचिका दायर करना. भविष्य में ऐसी हरकत दोहराने पर सख्त कार्रवाई की चेतावनी दी गई.
अंत में याचिका पूरी तरह खारिज कर दी गई. अदालत ने संदेश दिया कि न्यायालय सच्ची शिकायतों के लिए हमेशा खुले हैं, लेकिन बिना सबूत के सनसनीखेज दावों या प्रक्रिया के दुरुपयोग को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा. यह फैसला न्याय की गरिमा बनाए रखने की दिशा में महत्वपूर्ण है.