इंदौर के सिलिकॉन सिटी इलाके की गणेश रेसिडेंसी से जुड़ी लता बाई की कहानी कई सवाल खड़े करती है. संस्था से जुड़े लोगों के मुताबिक, लता बाई ने अपनी जिंदगी भर की जमा पूंजी और जेवर बेचकर एक फ्लैट खरीदा था. बाद में आरोप है कि उनके एक बेटे ने कथित तौर पर वह फ्लैट अपने नाम करवा लिया और इसके बाद लता बाई को घर से बाहर कर दिया गया. हालांकि, इस मामले में उनके बेटों का पक्ष सामने नहीं आया है.
घर छूटने के बाद लता बाई के सामने रहने और जीवन यापन की मुश्किलें खड़ी हो गईं. इसी दौरान उनकी जानकारी प्रीयु फाउंडेशन से जुड़े अजय नागदा तक पहुंची. संस्था के लोगों ने उनकी मदद की और मेडिकल जांच कराने के बाद उन्हें जानकी वृद्धाश्रम में आश्रय दिलाया.
लता बाई करीब आठ महीने तक वृद्धाश्रम में रहीं. इस दौरान संस्था से जुड़े लोग उनकी देखभाल करते रहे और उनकी जरूरतों का ध्यान रखते रहे. लेकिन कुछ समय बाद अचानक उनकी तबीयत बिगड़ गई. उन्हें इलाज के लिए इंदौर के एमवाय अस्पताल ले जाया गया. डॉक्टरों ने उपचार शुरू किया, लेकिन उनकी जान नहीं बचाई जा सकी. इलाज के दौरान लता बाई की मौत हो गई.
संस्था के मुताबिक, लता बाई के चार बेटे हैं. उनकी मौत के बाद सभी बेटों तक खबर पहुंचाने की कोशिश की गई. ओम शांति आश्रम की ब्रह्मकुमारी ज्योति दीदी के माध्यम से चारों बेटों को निधन की जानकारी दिए जाने का दावा संस्था ने किया है. संस्था के अनुसार, सूचना मिलने के बावजूद कोई भी बेटा अंतिम संस्कार में शामिल नहीं हुआ. इतना ही नहीं, चारों बेटों द्वारा मां को मुखाग्नि देने से इनकार करने की बात भी संस्था की ओर से कही गई है.
जब परिवार की ओर से कोई आगे नहीं आया तो प्रीयु फाउंडेशन और जानकी वृद्धाश्रम से जुड़े लोगों ने लता बाई के अंतिम संस्कार की जिम्मेदारी संभाली. जरूरी प्रक्रियाएं पूरी करने के बाद उनकी पार्थिव देह को रीजनल पार्क ले जाया गया. वहां समाजसेवियों ने पूरे सम्मान और विधि-विधान के साथ उनका अंतिम संस्कार किया. पिछले आठ महीनों से जिन लोगों ने लता बाई की देखभाल की थी, उन्हीं ने उनकी अंतिम यात्रा में भी उनका साथ दिया. फिलहाल यह मामला इस बात को लेकर चर्चा में है कि मुश्किल समय में लता बाई के साथ उनके परिवार के बजाय वे लोग खड़े रहे, जिनसे उनका कोई खून का रिश्ता नहीं था. जीवन के अंतिम दिनों में आश्रय देने से लेकर अंतिम विदाई तक समाजसेवियों ने उनकी जिम्मेदारी निभाई.