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बेंगलुरु की बारिश में डूबी समझ, क्या महाराजा के दौर की नालियां थीं ज्यादा समझदार?

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि बेंगलुरु की पुरानी जल प्रणाली को फिर से वैज्ञानिक तरीके से समझा जाए और अतिक्रमण हटाए जाएं, तो शहर एक बार फिर जल संकट और बाढ़ दोनों से राहत पा सकता है.

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Reepu Kumari


बेंगलुरु जिसे कभी भारत की गार्डन सिटी कहा जाता था. आज एक और पहचान के लिए मशहूर हो रहा है वो है बाढ़ से जूझता टेक सिटी. हल्की बारिश हो या भारी, कुछ घंटों में ही सड़कों पर पानी भर जाता है, ट्रैफिक रेंगने लगता है, और कॉलोनियां झीलों में तब्दील हो जाती हैं.

लेकिन एक सवाल बार-बार उठता है क्या बेंगलुरु की पुरानी, महाराजा युग की ड्रेनेज व्यवस्था आज की स्मार्ट इंजीनियरिंग से ज़्यादा स्मार्ट थी?

प्राकृतिक सोच, प्राकृतिक बहाव

बेंगलुरु के पुराने शासकों  विशेषकर वाडियार राजवंश और टीपू सुल्तान के समय  शहर की बनावट और जल निकासी प्रणाली को प्रकृति के अनुरूप बनाया गया था. उस समय 'राजकेय नालों' (राजकालुवे) का जाल ऐसा बुना गया था कि बारिश का पानी एक झील से दूसरी झील की ओर बहता था. हर झील ओवरफ्लो होने पर पानी अगली झील में पहुंचा देती थी. यह नेटवर्क न केवल बाढ़ से बचाता था, बल्कि भूजल को रिचार्ज भी करता था.

पुराना बनाम नया बेंगलुरु

आज का बेंगलुरु तेजी से शहरीकरण का शिकार हो चुका है. झीलें पाट दी गईं, नालों पर अपार्टमेंट्स और मॉल्स बन गए, और प्राकृतिक जल-मार्गों की अनदेखी हुई. नतीजा? हर मानसून के साथ शहर डूबता है.

2017 की एक रिपोर्ट के मुताबिक, बेंगलुरु की 262 झीलों में से केवल 81 ही अस्तित्व में हैं. राजकालुवे पर हो रहे अतिक्रमणों और अवैज्ञानिक विकास ने पानी के प्राकृतिक बहाव को रोक दिया है.

क्या सब कुछ खो गया है?

शायद नहीं. विशेषज्ञों का मानना है कि यदि बेंगलुरु की पुरानी जल प्रणाली को फिर से वैज्ञानिक तरीके से समझा जाए और अतिक्रमण हटाए जाएं, तो शहर एक बार फिर जल संकट और बाढ़ दोनों से राहत पा सकता है.

बेंगलुरु का इतिहास बताता है कि जब योजनाएं प्रकृति के साथ मिलकर बनाई जाती हैं, तब वे लंबे समय तक चलती हैं. महाराजा के दौर की जल प्रबंधन प्रणाली कोई आधुनिक टेक्नोलॉजी नहीं थी, परंतु उसमें स्थायित्व, समझ और प्रकृति से सामंजस्य था - जो आज की सबसे बड़ी जरूरत है.