नई दिल्ली: बेंगलुरु में बाल मजदूरी के खिलाफ शनिवार को पुलिस ने व्यापक अभियान चलाया. शहर के 12 पुलिस डिविजन की टीमों ने हजारों स्थानों पर जांच की और अलग-अलग जगहों से 503 बच्चों को काम से छुड़ाया. इस दौरान बच्चों को मजदूरी पर रखने वाले दुकानदारों के खिलाफ 18 मामले दर्ज किए गए. पुलिस और श्रम विभाग की संयुक्त टीमों ने बाजारों से लेकर निर्माण स्थलों तक निरीक्षण किया. अभियान का मकसद काम कर रहे बच्चों की पहचान कर उन्हें सुरक्षित माहौल और शिक्षा से जोड़ना था.
पुलिस कमिश्नर सीमांत कुमार सिंह के निर्देश पर यह विशेष अभियान चलाया गया. शहर के सभी थाना क्षेत्रों में अलग-अलग टीमें बनाई गई थीं. इनमें पुलिस अधिकारियों के साथ श्रम निरीक्षक भी शामिल रहे. टीमों ने बाल मजदूरी की आशंका वाले इलाकों को चिन्हित कर वहां जांच की. अभियान के दौरान 5,897 स्थानों का निरीक्षण किया गया. पुलिस के मुताबिक, कार्रवाई का मुख्य लक्ष्य बच्चों को मजदूरी से बाहर निकालना था.
जांच का दायरा केवल दुकानों तक सीमित नहीं रहा. पुलिस टीमों ने गोदाम, बाजार, होटल, लॉज और बेकरी की जांच की. इसके अलावा बस स्टॉप, रेलवे स्टेशन, अपार्टमेंट और निर्माण स्थलों पर भी निरीक्षण किया गया. इन जगहों पर काम करते मिले बच्चों की पहचान की गई और उन्हें वहां से सुरक्षित निकाला गया. पुलिस ने अभियान के दौरान कुल 503 बच्चों को मजदूरी से मुक्त कराने की जानकारी दी.
अभियान के दौरान बच्चों को काम पर रखने वालों पर भी कार्रवाई की गई. पुलिस ने ऐसे दुकानदारों के खिलाफ 18 मामले दर्ज किए हैं. अधिकारियों का कहना है कि बाल मजदूरी रोकने के लिए बच्चों को छुड़ाने के साथ जिम्मेदार लोगों पर कानूनी कार्रवाई भी जरूरी है. इस तरह की जांच से उन स्थानों की पहचान करने में मदद मिलती है, जहां कम उम्र के बच्चों को काम में लगाए जाने की आशंका रहती है.
बच्चों को काम से मुक्त कराने के बाद उन्हें तत्काल सुरक्षित स्थान पर रखने की व्यवस्था की जाती है. इसके लिए उन्हें शेल्टर होम ले जाया जाता है. इसके बाद उनकी उम्र और स्थिति के अनुसार सरकारी स्कूल में दाखिले की प्रक्रिया शुरू होती है. यानी कार्रवाई केवल बच्चों को काम से हटाने तक सीमित नहीं रहती, बल्कि उन्हें दोबारा पढ़ाई से जोड़ने पर भी जोर दिया जाता है.
14 वर्ष से अधिक उम्र के बच्चों के लिए कौशल प्रशिक्षण की व्यवस्था बताई गई है, ताकि वे आगे रोजगार के बेहतर अवसर हासिल कर सकें. परिवारों को भी सरकारी योजनाओं से जोड़ने का प्रयास किया जाता है. जानकारी के मुताबिक, दोषी मालिक से वसूली गई जुर्माने की राशि बच्चे के खाते में जमा की जाती है. UNICEF के हवाले से भारत में बाल मजदूरी के 18 लाख से अधिक मामले बताए गए हैं, जिससे समस्या की गंभीरता का अंदाजा लगाया जा सकता है.