दिल्ली: देश की राजधानी में राजनीतिक माहौल गरमाया हुआ है, जहां BJP सरकार के एक साल पूरे होने पर सड़कों और गलियों में 'एक साल, दिल्ली बेहाल, याद आ रहे केजरीवाल' जैसे पोस्टर लगे हुए हैं. इन पोस्टरों में न तो किसी नेता की तस्वीर है और न ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का नाम, लेकिन संदेश साफ है कि जनता पुरानी सरकार के दौर को याद कर रही है. दिल्ली प्रदेश AAP अध्यक्ष सौरभ भारद्वाज ने हाल ही में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में इस पर तंज कसा, जहां कॉन्फ्रेंस एक घंटे देरी से शुरू हुई।.
उन्होंने दिल्ली और केंद्र सरकार को 'धन्यवाद' देते हुए कहा कि पिछले तीन दिनों से मध्य दिल्ली में इतना भयंकर ट्रैफिक जाम है कि टैक्सी वाले भी उस इलाके में आने से कतराते हैं।यह वही दिल्ली है, जो 2025 से पहले AAP सरकार के समय में शिक्षा, स्वास्थ्य, बिजली और पानी जैसे क्षेत्रों में एक आदर्श मॉडल के रूप में जानी जाती थी. मोहल्ला क्लीनिक गरीबों और मध्यम वर्ग के लिए जीवनरक्षक साबित हुए थे, सरकारी स्कूलों की गुणवत्ता और सुविधाओं की तारीफ देश-दुनिया में होती थी. बिजली के बिलों में राहत, पानी की नियमित आपूर्ति और जनता की समस्याओं का त्वरित समाधान ने लोगों को महसूस कराया कि सरकार उनके साथ खड़ी है.
रेखा गुप्ता के नेतृत्व वाली BJP सरकार के एक साल में हालात उलट-पुलट होते नजर आ रहे हैं.शहर में लगे इन पोस्टरों ने सवाल खड़े कर दिए हैं कि अगर सबकुछ सामान्य है, तो केजरीवाल का नाम लेने से इतना परहेज क्यों? आज दिल्लीवासी पूछ रहे हैं कि मोहल्ला क्लीनिक क्यों बंद हो रहे हैं या उनकी रफ्तार क्यों सुस्त पड़ी है? सरकारी अस्पतालों में मरीजों की कतारें क्यों लंबी हो गईं? स्कूलों में पहले वाली जीवंतता और सुधार क्यों गायब हैं? ट्रैफिक जाम अब रोज की कहानी बन चुका है, प्रदूषण के स्तर में कमी के बजाय कई बार बढ़ोतरी देखी जा रही है.कई कॉलोनियों से पानी की कमी और सफाई व्यवस्था में लापरवाही की शिकायतें आम हो गई हैं
अरविंद केजरीवाल का दौर वह था, जब राजनीति 'काम' पर आधारित थी, न कि सिर्फ वादों पर.उन्होंने वोट के बदले ठोस बदलाव दिए- स्कूलों का कायाकल्प, क्लीनिकों का जाल और बिजली-पानी में सुविधा.यही कारण है कि आज जब दैनिक जीवन में परेशानियां बढ़ रही हैं, तो लोगों को वह पुराना समय याद आ रहा है. दिल्ली की जनता भावुक कम, व्यावहारिक ज्यादा है.अगर सुबह पानी न आए, बच्चे स्कूल में पुरानी सुविधाएं न पाएं, क्लीनिक में इलाज न मिले या जाम में घंटों बर्बाद हों, तो असंतोष बढ़ना लाजमी है.यही असंतोष अब पोस्टरों, बातचीतों और सोशल मीडिया पर उभर रहा है.