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जहां लगती थी माओवादियों की जन अदालत...अब वहीं बैठी लोकतंत्र की पंचायत, गांव में लोगों से मिल रहे SP और कलेक्टर

छत्तीसगढ़ के सुकमा जिले के नीलामड़गू गांव में जो कभी माओवादियों का गढ़ माना जाता था, अब प्रशासनिक अधिकारी ग्रामीणों के बीच पहुंचकर उनकी समस्याएं सुन रहे हैं.

Km Jaya
Edited By: Km Jaya
जहां लगती थी माओवादियों की जन अदालत...अब वहीं बैठी लोकतंत्र की पंचायत, गांव में लोगों से मिल रहे SP और कलेक्टर
Courtesy: Pinterest

सुकमा: छत्तीसगढ़ के सुकमा जिले के घने जंगलों के बीच स्थित गांवों में अब एक नई तस्वीर दिखाई देने लगी है. जिन जगहों पर कभी माओवादियों की जन अदालत लगती थी, वहां अब लोकतंत्र की पंचायत बैठ रही है. प्रशासनिक अधिकारी ग्रामीणों के बीच पहुंचकर उनकी समस्याएं सुन रहे हैं और विकास योजनाओं की जानकारी दे रहे हैं.

सुकमा जिले के कोंटा विकासखंड के कई गांव लंबे समय तक माओवादी प्रभाव में रहे हैं. यहां के नीलामड़गू गांव को शीर्ष माओवादी नेता पापाराव का गांव माना जाता है. कभी यह इलाका प्रशासन के लिए बेहद संवेदनशील और खतरनाक माना जाता था. लेकिन अब वहां के हालात बदलते दिखाई दे रहे हैं.

अभी कैसी है वहां की स्थिति?

नीलामड़गू गांव में हाल ही में कलेक्टर अमित कुमार और पुलिस अधीक्षक किरण चव्हाण ग्रामीणों के बीच पहुंचे. उन्होंने गांव के चौक पर बैठकर लोगों से बातचीत की और सरकारी योजनाओं की जानकारी दी. अधिकारियों ने ग्रामीणों से उनकी समस्याएं भी सुनीं और विकास कार्यों के बारे में चर्चा की.

पहले कैसी थी वहां की स्थिति?

यह वही इलाका है जहां कुछ साल पहले तक प्रशासनिक अधिकारियों का जाना भी जोखिम भरा माना जाता था. साल 2012 में सुकमा जिला मुख्यालय से करीब 20 किलोमीटर दूर केरलापाल गांव में तत्कालीन कलेक्टर एलेक्स पाल मेनन का माओवादियों ने अपहरण कर लिया था. उस घटना के बाद यह इलाका लंबे समय तक सुरक्षा के लिहाज से बेहद संवेदनशील माना जाता रहा.

हालांकि पिछले कुछ वर्षों में सुरक्षा बलों के कैंप स्थापित होने के बाद स्थिति धीरे धीरे बदलने लगी है. अब इन इलाकों में सड़क निर्माण शुरू हो गया है, बसों का संचालन होने लगा है और कई सरकारी योजनाओं का लाभ ग्रामीणों तक पहुंच रहा है. प्रशासन की टीमें लगातार ऐसे गांवों का दौरा कर रही हैं, जहां पहले जाना मुश्किल माना जाता था.

कलेक्टर अमित कुमार ने क्या बताया?

कलेक्टर अमित कुमार ने बताया कि इन इलाकों में सबसे पहले लोगों का भरोसा जीतना जरूरी था. इसके लिए सुरक्षा व्यवस्था के साथ साथ सड़क, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी मूलभूत सुविधाओं पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है. उनका कहना है कि सरकार की कोशिश है कि विकास सीधे गांवों तक पहुंचे और लोग बदलाव महसूस करें.

गांव के बुजुर्ग विज्जा बताते हैं कि पहले यहां दिनदहाड़े माओवादी आते थे और गांव में उनके ही आदेश चलते थे. अब स्थिति बदल रही है और अधिकारी गांव में बैठकर उनकी समस्याएं सुन रहे हैं.

इसी तरह दंतेवाड़ा जिले के सुदूर गांव पुरंगेल में भी कलेक्टर देवेश कुमार ध्रुव बाइक से पहुंचकर ग्रामीणों से मिले. उन्होंने गांव में सड़क, पेयजल और आजीविका योजनाओं को शुरू करने के निर्देश दिए. इन पहाड़ी और जंगलों वाले इलाकों में अब विकास और लोकतंत्र की नई शुरुआत दिखाई दे रही है.