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छत्तीसगढ़ के बीजापुर के जंगलों में एनकाउंटर में मारे गए गए कई नक्सली, सुरक्षा बलों की बड़ी कार्रवाई

दंतेवाड़ा–बीजापुर सीमा के केशकुतुल जंगलों में सुरक्षा बलों और नक्सलियों के बीच मुठभेड़ जारी है. कई माओवादी मारे जाने की खबर है, लेकिन आधिकारिक पुष्टि का इंतजार है. क्षेत्र में संयुक्त ऑपरेशन तेज कर दिए गए हैं.

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Edited By: Kuldeep Sharma
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Courtesy: social media

छत्तीसगढ़ के बस्तर संभाग में नक्सल विरोधी अभियान ने एक बार फिर रफ्तार पकड़ ली है. दंतेवाड़ा और बीजापुर की सीमा पर भैरमगढ़ क्षेत्र के केशकुतुल के घने जंगलों में सुबह से जारी मुठभेड़ ने पूरे इलाके में अलर्ट बढ़ा दिया है. 

सूत्रों के अनुसार कई नक्सलियों के ढेर होने की खबर है, हालांकि प्रशासन ने अभी इसकी आधिकारिक पुष्टि नहीं की है. हाल के दिनों में बढ़े आत्मसमर्पण और ऑपरेशन की रणनीति बदले पर सुरक्षा एजेंसियां लगातार सख्त दिखाई दे रही हैं.

जंगलों में सुबह से गूंजती गोलियों की आवाज

दंतेवाड़ा से निकली सुरक्षा बलों की टीम जैसे ही बीजापुर सीमा के पास केशकुतुल क्षेत्र में पहुंची, वहां छिपे नक्सलियों ने फायरिंग शुरू कर दी. दोनों ओर से रुक-रुककर चल रही गोलीबारी ने पूरे इलाके में तनाव बढ़ा दिया. प्रारंभिक जानकारी में कई माओवादी मारे जाने की बात सामने आई है, लेकिन किसी भी हताहत की आधिकारिक जानकारी फिलहाल जारी नहीं की गई है.

15 दिनों की शांत रणनीति के बाद फिर तेजी

बीते दिनों सुरक्षा एजेंसियों ने आत्मसमर्पण कराने को लेकर जंगल में शांत माहौल बनाया था. लगभग 15 दिनों तक किसी बड़े अभियान या दबाव को रोक दिया गया था, ताकि नक्सली नेताओं को आत्मसमर्पण का रास्ता चुनने का अवसर मिल सके. लेकिन जब बटालियन की तरफ से किसी तरह की सकारात्मक प्रतिक्रिया नहीं मिली, तब एजेंसियों ने फिर संयुक्त ऑपरेशन को तेज करने का निर्णय लिया.

आत्मसमर्पणों की श्रृंखला से कमजोर होते गुट

हाल ही में डीकेएसजेडसी सदस्य चैतू उर्फ श्याम दादा ने अपने 9 साथियों के साथ आत्मसमर्पण करके नक्सली ढांचे में बड़ी दरार डाल दी थी. इससे पहले देवा, पापाराव और केसा जैसे महत्वपूर्ण नाम भी आत्मसमर्पण की चर्चाओं में रहे. सुरक्षा अधिकारियों के अनुसार लगातार हो रहे समर्पण से नक्सली टीमों की शक्ति कमजोर हो रही है और कई गुट बिखराव का सामना कर रहे हैं.

नक्सलवाद की सोच कमजोर पड़ रही

बस्तर आईजी सुंदरराज पी. ने कहा कि नक्सलियों की खोखली विचारधारा अब उनके अपने ही लोगों को भ्रमित नहीं कर पा रही. उन्होंने बताया कि अधिकतर नक्सली अब समझ रहे हैं कि हिंसा समाधान नहीं है. यही वजह है कि वे अपने साथियों को हथियार छोड़कर मुख्यधारा में लौटने के लिए प्रेरित कर रहे हैं. लगातार हो रहे आत्मसमर्पण इसी बदलते माहौल का संकेत हैं.

कॉलेज से जंगल तक और फिर वापसी

चैतू उर्फ श्याम दादा ने पत्रकारों को बताया कि कॉलेज के दिनों में वह नक्सलियों की मेडिकल टीम के संपर्क में आया था और 1985 में भूमिगत होकर संगठन से जुड़ गया. वर्षों तक दरभा डिवीजन में सक्रिय रहने के बाद उसने बदलते हालात को समझते हुए आत्मसमर्पण का निर्णय लिया. उसके सरेंडर से दरभा डिवीजन को बड़ा झटका लगा है और सुरक्षा बलों का प्रभाव और मजबूत हुआ है.