menu-icon
India Daily

छत्तीसगढ़ में तेज हुआ डी-माइनिंग अभियान, नक्सल प्रभावित इलाकों से IED हटाने में जुटे सुरक्षाबल, लौट रहा भरोसा

केंद्र सरकार द्वारा “नक्सल मुक्त भारत” की घोषणा के बाद छत्तीसगढ़ में डी-माइनिंग अभियान तेज हो गया है. CRPF, DRG और अन्य एजेंसियां सड़कों व गांवों को सुरक्षित बनाने के लिए IED निष्क्रिय कर रही हैं.

Dhiraj Kumar Dhillon
छत्तीसगढ़ में तेज हुआ डी-माइनिंग अभियान, नक्सल प्रभावित इलाकों से IED हटाने में जुटे सुरक्षाबल, लौट रहा भरोसा

केंद्र सरकार द्वारा 31 मई 2026 को नक्सल मुक्त भारत की घोषणा के बाद छत्तीसगढ़ में डी-माइनिंग अभियान ने रफ्तार पकड़ ली है. सुरक्षा बल अब उन इलाकों में बड़े पैमाने पर अ‌भियान चला रहे हैं, जो लंबे समय तक नक्सली हिंसा से प्रभावित रहे. इसका मकसद आम लोगों के लिए सुरक्षित आवाजाही सुनिश्चित करना और क्षेत्र में सामान्य स्थिति बहाल करना है.

सीआरपीएफ, छत्तीसगढ़ पुलिस के डिस्ट्रिक्ट रिजर्व गार्ड (DRG) और अन्य सुरक्षा एजेंसियां मिलकर उन इम्प्रोवाइज्ड एक्सप्लोसिव डिवाइस (IED) को खोजने और निष्क्रिय करने में जुटी हैं, जिन्हें नक्सलियों ने वर्षों पहले सड़कों और जंगलों में लगाया था. अ‌भियान राष्ट्रीय राजमार्गों, राज्य राजमार्गों और अंदरूनी संपर्क मार्गों पर चलाया जा रहा है, जिन्हें पहले अत्यधिक संवेदनशील माना जाता था.

मिशन बना डी-माइनिंग ऑपरेशन

सीआरपीएफ की 80वीं बटालियन के कमांडेंट जितेंद्र कुमार ने बताया कि डी-माइनिंग ऑपरेशन अब सभी बटालियनों का प्रमुख मिशन बन चुका है. उन्होंने कहा कि पूर्व नक्सलियों से मिले इनपुट और खुफिया सूचनाएं इस अभियान में काफी मददगार साबित हो रही हैं.लक्ष्य यह है कि लोग बिना किसी सुरक्षा डर के स्वतंत्र रूप से यात्रा कर सकें.

ड्रोन एवं स्कवाड एवं आधुनिक उपकरणों का इस्तेमाल

सुरक्षा बल डी-माइनिंग के लिए आधुनिक तकनीकों का इस्तेमाल कर रहे हैं. इसमें ट्रैक्टर, कॉम्पैक्ट वायर डिटेक्टर और विशेष उपकरणों से लैस के9 डॉग स्कवाड का उपयोग किया जा रहा है. अभियान शुरू करने से पहले ड्रोन के जरिए इलाके की निगरानी की जाती है, ताकि किसी भी संदिग्ध गतिविधि या विस्फोटक की पहचान की जा सके.

सीआरपीएफ के डिप्टी कमांडेंट मकसूद आलम ने बताया कि यह अभियान केवल एक जिले तक सीमित नहीं है, बल्कि कई बटालियनों के समन्वय से चलाया जा रहा है. इसका मकसद दूर-दराज के गांवों को सुरक्षित संपर्क मार्ग उपलब्ध कराना और विकास कार्यों को गति देना है.

स्थानीय लोगों में बढ़ रहा भरोसा

सुरक्षा अधिकारियों का मानना है कि डी-माइनिंग अभियान नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में सबसे महत्वपूर्ण पोस्ट- कॉन्फ्लिक्ट पहल साबित हो सकता है. कई गांवों के लोग वर्षो से आईईडी विस्फोट के डर से कुछ रास्तों का इस्तेमाल करने से बचते रहे हैं. अब इन इलाकों को सुरक्षित बनाकर लोगों को भरोसा लौटाने की कोशिश की जा रही है. अधिकारियों का उम्मीद है कि इन अभियानों से सड़क संपर्क बेहतर होगा, विकास परियोजनाओं को गति मिलेगी और लंबे समय से हिंसा प्रभावित क्षेत्रों में जन-जीवन सामान्य होगा.