कृषि कमोडिटी एक्सचेंज नेशनल कमोडिटी एक्सचेंज (NCDEX) ने भारत का पहला एक्सचेंज-ट्रेडेड मौसम डेरिवेटिव कॉन्ट्रेक्ट 'RAINMUMBAI' लॉन्च किया है. यह कॉन्ट्रेक्ट मुंबई में बारिश के आंकड़ों पर आधारित है. ये आंकड़े भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (IMD) से प्राप्त किये जाएंगे.
NCDEX के एमडी और सीईओ अरुण रास्ते ने कहा, 'भारत सदियों से मानसून की अनिश्चितता के साथ जी रहा है. रेनमुंबई सभी हितधारकों को इस अनिश्चितता को मैनेज करने के लिए एक रेग्यूलेटेड, वैज्ञानिक उपकरण प्रदान करता है.'
एक्सचेंज के अनुसार, यह कॉन्ट्रैक्ट बाजार प्रतिभागियों को वर्षा में होने वाला उतार-चढ़ाव से उत्पन्न वित्तीय जोखिम से बचाव में मदद करने के लिए बनाया गया है. इस कॉन्ट्रैक्ट का निपटान नकद में किया जाएगा और यह मॉनसून के मौसम के दौरान शहर के दीर्घकालिक औसत (LPA) से बारिश के वास्तविक विचलन को ट्रैक करेगा.
व्यापार के लिए केवल जून, जुलाई, अगस्त और सितंबर महीने के अनुबंध ही व्यापार के लिए उपलब्ध होंगे, जो मुंबई के मानसून पैटर्न को ट्रैक करेंगे.
ये कॉन्ट्रैक्ट वैज्ञानिक रूप से स्ट्रक्चर्ड क्युमुलेटिव रेनफॉल डेविएशन (CDR) मॉडल पर आधारित हैं. यह मॉडल मानसून के महीनों (सितंबर) के दौरान वास्तविक वर्षा का दीर्घकालिक औसत (LPA) से विचलन मापता है. इस मॉडल और उत्पाद को आईआईटी बॉम्बे के सहयोग से विकसित किया गया है.
हालांकि NCDEX ने ल्किविडिटी संबंधी चिंताओं को भी स्वीकार किया है और व्यापारियों के लिए कॉन्ट्रैक्ट की लिक्विडिटी सुनिश्चित करने के लिए एक बाजार निर्माता नियुक्त किया गया है.
ये मौसम आधारित एक वित्तीय कॉन्ट्रैक्ट है. इसमें मौसम के आधार पर ट्रेडिंग होती है. इसे मौसम से होने वाले नुकसान से बचाने के लिए बनाया जाता है. इसका इस्तेमाल खासतौर पर खेती, बिजली, पर्यटन, एयरलाइन और एनर्जी कंपनियां करती हैं.
आसान भाषा में समझें तो अगर अगर किसी बिजनेस की कमाई बारिश, गर्मी, ठंड या बर्फबारी पर निर्भर करती है, तो वह मौसम डेरिवेटिव खरीदकर अपने नुकसान का जोखिम कम कर सकता है.
मान लीजिए किसी शहर में एक आइसक्रीम कंपनी है. उसकी बिक्री गर्मियों में ज्यादा होती है. लेकिन अगर मौसम ठंडा निकल गया तो बिक्री गिर जाएगी. ऐसे में कंपनी एक मौसम डेरिवेटिव कॉन्ट्रैक्ट खरीदती है.
कॉन्ट्रैक्ट में पहले से तय होता है कि अगर तापमान एक सीमा से नीचे गया, तो कंपनी को भुगतान मिलेगा.
अगर मौसम खराब हुआ तो बिजनेस को नुकसान होगा लेकिन डेरिवेटिव से पैसा मिल जाएगा. अगर मौसम अच्छा रहा तो बिजनेस को ज्यादा फायदा होगा और डेरिवेटिव की जरूरत नहीं पड़ेगी. यह बिल्कुल बीमा जैसा लगता है लेकिन इसमें फर्क है. बीमा वास्तविक नुकसान साबित करने पर मिलता है, जबकि मौसम डेरिवेटिव मौसम के डेटा के आधार पर तय होता है.
उदाहरण के लिए अगर कॉन्ट्रैक्ट में लिखा है कि जून में 200 मिमी से कम बारिश हुई तो भुगतान मिलेगा, और वास्तव में 150 मिमी बारिश हुई, तो खरीदार को पैसा मिल जाएगा.
जोखिम कम होता है
कृषि, होटल, बिजली और ट्रैवल कंपनियां मौसम के कारण होने वाले बड़े नुकसान से बच सकती हैं.
कमाई स्थिर रहती है
अगर मौसम खराब हो जाए तब भी कंपनी की आय पूरी तरह नहीं टूटती.
बेहतर प्लानिंग होती है
कंपनियां पहले से अपने खर्च और मुनाफे का अनुमान लगा पाती हैं.
निवेशकों के लिए नया अवसर
कुछ ट्रेडर मौसम के अनुमान के आधार पर भी ट्रेडिंग करते हैं.
• किसान और कृषि कंपनियां.
• बिजली कंपनियां.
• एयरलाइंस.
• होटल और पर्यटन उद्योग.
• पेय पदार्थ और आइसक्रीम कंपनियां.
अमेरिका और यूरोप में मौसम डेरिवेटिव का बाजार काफी बड़ा है. वहां कई कंपनियां तापमान और बारिश के आंकड़ों के आधार पर करोड़ों डॉलर के कॉन्ट्रैक्ट करती हैं. भारत में यह बाजार अभी शुरुआती स्तर पर है, लेकिन जलवायु परिवर्तन और अनिश्चित मौसम के कारण भविष्य में इसकी अहमियत तेजी से बढ़ सकती है.