भारत के खेल इतिहास में कुछ नाम ऐसे हैं, जिन्होंने अपनी मेहनत, लगन और संघर्ष से आने वाली पीढ़ियों के लिए नई राह बनाई. उन्हीं महान खिलाड़ियों में शामिल हैं पीटी उषा, जिन्हें भारतीय एथलेटिक्स की 'क्वीन' और 'पायोली एक्सप्रेस' के नाम से जाना जाता है. केरल के एक छोटे से गांव से निकलकर अंतरराष्ट्रीय मंच पर देश का गौरव बढ़ाने वाली उषा आज भी लाखों खिलाड़ियों के लिए प्रेरणा का स्रोत हैं. उनका जीवन इस बात का प्रमाण है कि सीमित संसाधनों के बावजूद दृढ़ संकल्प और निरंतर मेहनत से असंभव लक्ष्य भी हासिल किए जा सकते हैं.
27 जून 1964 को केरल के मेलाडी-पायोली क्षेत्र में जन्मीं पीटी उषा ने बेहद साधारण परिवार में परवरिश पाई. बचपन से ही उनकी खेल प्रतिभा रुचि साफ दिखाई देने लगी थी. महज 12 साल की उम्र में उन्हें केरल सरकार की छात्रवृत्ति मिली और राष्ट्रीय विद्यालय खेलों के दौरान प्रसिद्ध कोच ओ.एम. नाम्बियार की नजर उन पर पड़ी. यहीं से उनके शानदार एथलेटिक्स करियर की नींव रखी गई.
पीटी उषा ने केवल 16 साल की उम्र में ही 1980 मॉस्को ओलंपिक में भारत का प्रतिनिधित्व किया था. वह उस समय ओलंपिक में भाग लेने वाली सबसे युवा भारतीय स्प्रिंटर्स में शामिल थीं. इसके बाद 1984 लॉस एंजिल्स ओलंपिक में उन्होंने 400 मीटर बाधा दौड़ के फाइनल में जगह बनाई, लेकिन कांस्य पदक से मात्र 0.01 सेकंड से चूक गईं. हालांकि यह हार उनके करियर की सबसे बड़ी प्रेरणा बन गई.
ओलंपिक के बाद पीटी उषा ने एशियाई प्रतियोगिताओं में शानदार प्रदर्शन किया. 1983 एशियाई चैंपियनशिप में उन्होंने एक स्वर्ण और एक रजत पदक जीता. इसके बाद 1985 एशियाई चैंपियनशिप में पांच स्वर्ण सहित छह पदक अपने नाम किए. वहीं 1986 सियोल एशियाई खेलों में उन्होंने चार गोल्ड मेडल जीतकर भारतीय एथलेटिक्स को नई पहचान दिलाई. अपने करियर में उन्होंने एशियाई स्तर पर 14 गोल्ड और राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में 100 से ज्याद पदक हासिल किए.
प्रतिस्पर्धी एथलेटिक्स से संन्यास लेने के बाद भी पीटी उषा खेलों से दूर नहीं हुईं. उन्होंने केरल में उषा स्कूल ऑफ एथलेटिक्स की स्थापना की, जहां युवा खिलाड़ियों, विशेषकर बेटियों को विश्वस्तरीय प्रशिक्षण दिया जाता है. उनकी अकादमी से कई प्रतिभाशाली एथलीट राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत का प्रतिनिधित्व कर चुके हैं.
खेल उपलब्धियों के बाद पीटी उषा ने प्रशासनिक क्षेत्र में भी नया इतिहास बनाया. वर्ष 2022 में वह भारतीय ओलंपिक संघ (IOA) की पहली महिला अध्यक्ष बनीं. इसके बाद 2023 में उन्हें राज्यसभा के लिए मनोनीत किया गया. आज भी वह भारतीय खेलों के विकास और खिलाड़ियों को बेहतर अवसर उपलब्ध कराने की दिशा में सक्रिय भूमिका निभा रही हैं.