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ग्रैंडमास्टर भाई-बहन: वैशाली-प्रग्गनानंद ने रचा इतिहास, दुनिया ने किया सलाम

प्रज्ञानानंदा और वैशाली विश्व चैंपियन  मैच के लिए क्वालीफाइंग टूर्नामेंट कैंडिडेट्स में जगह बनाने वाली पहली भाई-बहन की जोड़ी भी बन गये. वैशाली के छोटे भाई प्रज्ञानानंदा ने 2018 में जीएम खिताब हासिल किया था जब वह महज 12 साल के थे.

Gyanendra Sharma
ग्रैंडमास्टर भाई-बहन: वैशाली-प्रग्गनानंद ने रचा इतिहास, दुनिया ने किया सलाम

नई दिल्ली: वैशाली रमेशबाबू शुक्रवार को स्पेन में IV एल लोब्रेगेट ओपन में ग्रैंडमास्टर खिताब हासिल कर इतिहास रच दिया है. वैशाली 2500 FIDE रेटिंग को पार करने के बाद कोनेरू हम्पी और हरिका द्रोणावल्ली के बाद भारत की तीसरी महिला ग्रैंडमास्टर बन गईं. 22 वर्षीय वैशाली  ने रेटिंग को पार करने के लिए दूसरे दौर में तुर्की के एफएम टैमर तारिक सेलेब्स (2238) को हराया है और लगातार दो जीत के साथ टूर्नामेंट की शुरुआत की है.

इस तरह प्रज्ञानानंदा और वैशाली विश्व चैंपियन  मैच के लिए क्वालीफाइंग टूर्नामेंट कैंडिडेट्स में जगह बनाने वाली पहली भाई-बहन की जोड़ी भी बन गये. वैशाली के छोटे भाई प्रज्ञानानंदा ने 2018 में जीएम खिताब हासिल किया था जब वह महज 12 साल के थे.

विश्वनाथन आनंद ने बधाई

शतरंज के महान खिलाड़ी विश्वनाथन आनंद ने सोशल नेटवर्किंग मंच ‘एक्स’ पर वैशाली को बधाई देते हुए कहा, ‘‘पिछले कुछ महीनों में उसने काफी मेहनत की है और यह अच्छा संकेत है क्योंकि वह कैंडिडेट्स टूर्नामेंट के लिए तैयारी कर रही है. उनके माता-पिता को बधाई. 

पिता रमेशबाबू खुद शतरंज खिलाड़ी हैं

वैशाली के पिता रमेशबाबू खुद एक शतरंज खिलाड़ी हैं जिन्होंने ही अपने बच्चों को इस खेल में आने के लिए प्रोत्साहित किया. शतरंज में वैशाली की यात्रा उसके भाई प्रज्ञानानंद के साथ जुड़ी हुई है. दोनों ने लगातार समानांतर सफलता हासिल की है, विभिन्न प्रतियोगिताओं में समान पदक अर्जित किए हैं, जैसे ओलंपियाड में दोहरा कांस्य और एशियाई खेलों में दोहरा रजत. वैशाली को शतरंज से परिचय उसके पिता रमेशबाबू ने कराया था, जो स्वयं एक शौकीन शतरंज खिलाड़ी थे. अपनी बेटी की क्षमता को पहचानकर उन्होंने उसे पांच साल की उम्र से ही शतरंज की कोचिंग के लिए भेज दिया. वह तेजी से आगे बढ़ी और अपने आयु वर्ग में कई राज्य और राष्ट्रीय स्तर के टूर्नामेंट जीते.

रमेश ने बताया किजब मैंने उनके साथ काम करना शुरू किया तो वे दोनों पहले से ही एक दिन में छह से आठ घंटे अभ्यास कर रहे थे. वे बहुत मेहनती थे, महत्वाकांक्षी तो दूर की बात है. उस समय वह एक बेहतर खिलाड़ी थी, अधिक उम्र की थी और उसकी रेटिंग भी अधिक थी. लेकिन कुछ साल बाद, प्राग ने तेजी से विकास किया और उससे आगे निकल गया. 

बचपन में छोड़ी छाप

2015 में वैशाली ने अंडर-14 लड़कियों की श्रेणी में एशियाई युवा शतरंज चैंपियनशिप जीतकर अंतरराष्ट्रीय शतरंज मंच पर अपनी छाप छोड़ी. इसी दौरान उन्हें इंटरनेशनल मास्टर (आईएम) की उपाधि भी मिली. अंतर्राष्ट्रीय मास्टर से अपना तीसरा जीएम नॉर्म प्राप्त करने में उसे कई साल लग गए होंगे, लेकिन अपने भाई की तरह, वह इतिहास की किताबों को फिर से लिख सकती है.