Artificial Blood: जापान को जब भी नई तकनीक और नवाचार की बात होती है, तो सबसे आगे माना जाता है. अब वह एक और बड़ी उपलब्धि की ओर बढ़ रहा है. वह आर्टिफिशियल ब्लड (कृत्रिम रक्त) बनाने की दिशा में आगे बढ़ रहा है. नारा मेडिकल यूनिवर्सिटी ने घोषणा की है कि वह जल्द ही आर्टिफिशियल रेड ब्लड सेल्स के क्लिनिकल ट्रायल की शुरुआत करेगी. इन रक्त कोशिकाओं को इमरजेंसी की स्थिति में ट्रांसफ्यूजन के लिए इस्तेमाल किया जा सकेगा.
जापान की योजना है कि इन कृत्रिम रक्त कोशिकाओं को 2030 तक व्यावसायिक उपयोग में लाया जाए. यह दुनिया में पहली बार होगा जब किसी देश में इस प्रकार का आर्टिफिशियल ब्लड आम लोगों के लिए उपलब्ध होगा.
क्यों जरूरत पड़ी आर्टिफिशियल ब्लड की?
जापान में जनसंख्या घट रही है और बुजुर्गों की संख्या लगातार बढ़ रही है. 2024 में जापान में 65 साल या उससे अधिक उम्र के लोगों की संख्या 3.6 करोड़ से भी ज्यादा थी, जो कुल आबादी का लगभग 29.3% है.
इसका असर रक्तदान पर पड़ा है, क्योंकि ज्यादातर बुजुर्ग लोग रक्तदान नहीं कर सकते. ऐसे में रक्त की उपलब्धता में कमी आ रही है. इसके अलावा, पारंपरिक रक्त कोशिकाएं एक महीने से ज्यादा स्टोर नहीं की जा सकतीं, जबकि कृत्रिम रक्त कोशिकाएं दो साल तक कमरे के तापमान पर सुरक्षित रखी जा सकती हैं.
बिना ब्लड ग्रुप मिलान के भी इस्तेमाल संभव
कृत्रिम रक्त कोशिकाओं की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इन्हें किसी भी ब्लड ग्रुप वाले व्यक्ति को दिया जा सकता है. इससे आपातकालीन स्थिति में तुरंत इलाज संभव हो सकेगा, बिना ब्लड ग्रुप जांचे.
नारा मेडिकल यूनिवर्सिटी कर रही है ट्रायल का नेतृत्व
इस प्रोजेक्ट का नेतृत्व नारा मेडिकल यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर हीरोमी सकाई कर रहे हैं. उनका तरीका यह है कि पुराने डोनर ब्लड से हीमोग्लोबिन निकाला जाता है, जो ऑक्सीजन ले जाने वाला अणु होता है. फिर इसे एक खास आवरण में बंद कर दिया जाता है ताकि यह वायरस से मुक्त और स्थिर बन सके.
कृत्रिम ब्लड कैसे बनाया जाता है?
इस प्रक्रिया की शुरुआत स्टेम सेल्स से होती है. वैज्ञानिक ऐसे स्टेम सेल्स का उपयोग करते हैं जो विभिन्न प्रकार की रक्त कोशिकाओं में बदल सकते हैं. फिर इन्हें लैब में विकसित कर आर्टिफिशियल ब्लड तैयार किया जाता है.
क्या दूसरे देश भी कर रहे हैं कोशिश?
जी हाँ, अमेरिका की सेना ने ErythroMer नाम की एक यूनिवर्सल ब्लड प्रोडक्ट पर $46 मिलियन का निवेश किया है. यूके में भी 2022 में लैब में बने रेड ब्लड सेल्स को मानव शरीर में ट्रांसफ्यूज कर उनकी सुरक्षा और असर को परखा गया.
आगे क्या होगा?
अगर जापान का ट्रायल सफल रहता है और 400ml तक किसी साइड इफेक्ट की पुष्टि नहीं होती, तो इसका अगला चरण इसकी सुरक्षा और प्रभावशीलता को लेकर होगा. यदि सब कुछ योजना के अनुसार चलता है, तो आर्टिफिशियल ब्लड जल्द ही मेडिकल क्षेत्र में क्रांति ला सकता है.