नई दिल्ली: किसी परीक्षा में एक बार असफल होना ही कई युवाओं के लिए बड़ा झटका बन जाता है, लेकिन विवेक यादव की कहानी इससे कहीं आगे की है. उन्होंने सफलता तक पहुंचने से पहले एक-दो नहीं, बल्कि 18 परीक्षाओं में असफलता देखी. आर्थिक परेशानियों के बीच पढ़ाई का खर्च उठाया, बच्चों को ट्यूशन पढ़ाया और लगातार कोशिश करते रहे. कई बार हालात इतने मुश्किल हुए कि उनका हौसला टूटने लगा, फिर भी उन्होंने अपने लक्ष्य से मुंह नहीं मोड़ा.
मध्य प्रदेश के चंदेरी से निकलकर दिल्ली विश्वविद्यालय के हिंदू कॉलेज तक पहुंचना भी विवेक के लिए आसान नहीं था. उनके पिता ड्राइवर हैं, जबकि मां आंगनवाड़ी में काम करती हैं. परिवार की सीमित आमदनी के बावजूद विवेक ने पढ़ाई जारी रखी. उनके चाचा चाहते थे कि वह यूपीएससी परीक्षा पास करें. यही सपना धीरे-धीरे विवेक का लक्ष्य बन गया और उन्होंने सिविल सेवा परीक्षा की तैयारी शुरू कर दी.
दिल्ली में तैयारी के दौरान आर्थिक परेशानी लगातार उनके सामने रही. विवेक के मुताबिक, परिवार की कुल मासिक आय करीब 10 हजार रुपये थी. ऐसे में पढ़ाई और रहने का खर्च जुटाना चुनौती बन गया. उन्होंने परिवार पर अतिरिक्त बोझ न पड़े, इसलिए बच्चों को ट्यूशन पढ़ाना शुरू किया. करीब तीन साल तक यूपीएससी प्रारंभिक परीक्षा में असफलता मिली. इसके बाद सी-सैट में भी नाकामी ने उनकी मुश्किलें और बढ़ा दीं.
यूपीएससी में लगातार असफल होने के बाद विवेक ने दूसरी सरकारी नौकरियों की परीक्षाएं भी दीं. उन्होंने MPPSC, UPPSC, असिस्टेंट कमांडेंट, पटवारी, केंद्रीय विद्यालय और दिल्ली पुलिस कांस्टेबल समेत अलग-अलग परीक्षाओं में किस्मत आजमाई. लेकिन नतीजे बार-बार उनके खिलाफ रहे. कुल 18 परीक्षाओं में असफलता मिलने के बाद उनका आत्मविश्वास बुरी तरह प्रभावित हुआ. एक समय ऐसा भी आया, जब उन्हें लगा कि मेहनत के बावजूद मंजिल उनसे दूर होती जा रही है.
लगातार मिल रही नाकामी का असर विवेक पर इतना पड़ा कि एक सफर के दौरान वह ट्रेन में रोने लगे. निराशा में उन्होंने अपने पेपर तक फाड़कर फेंक दिए. यह उनके संघर्ष का सबसे कठिन दौर था. आसपास के लोगों के तानों और भविष्य की चिंता ने दबाव बढ़ा दिया था. इसके बावजूद उन्होंने खुद को संभाला. उन्होंने तय किया कि असफलताओं को अपनी पहचान नहीं बनने देंगे और फिर से तैयारी में जुट जाएंगे.
विवेक ने मुश्किल दौर में गीता के निष्काम कर्म के विचार को अपने जीवन में अपनाया. उन्होंने परिणाम की चिंता छोड़कर अपने प्रयास पर ध्यान देने की कोशिश की. दिल्ली में संघर्ष के बाद उन्होंने घर लौटकर तैयारी की और माता-पिता के सहयोग से लक्ष्य पर ध्यान बनाए रखा. उनके लिए यह बदलाव अहम साबित हुआ. धीरे-धीरे उन्होंने अपनी कमियों को समझा और परीक्षा की तैयारी को पहले से अधिक गंभीरता के साथ आगे बढ़ाया.
विवेक की वर्षों की मेहनत आखिरकार रंग लाई. 22 अप्रैल 2025 को UPSC 2024 का अंतिम परिणाम सामने आया तो उनकी खुशी का ठिकाना नहीं रहा. सूची में 413वीं रैंक देखकर उनकी आंखों से आंसू निकल आए. जिस परिवार ने सीमित साधनों के बावजूद उनका साथ दिया, उसकी मेहनत भी इस सफलता में शामिल थी. सात साल के संघर्ष के बाद विवेक ने साबित कर दिया कि लगातार असफल होना मंजिल का अंत नहीं होता. सही दिशा में जारी प्रयास आखिरकार सफलता तक पहुंचा सकता है.