नई दिल्ली: कभी घर में बिजली नहीं थी, पढ़ने के लिए सीमित साधन थे और स्कूल पहुंचने के लिए लंबा सफर तय करना पड़ता था. परिवार की आर्थिक स्थिति ऐसी थी कि पढ़ाई के साथ शरण कांबले को मां के साथ सब्जी बेचने जाना पड़ता था. पिता गटर खोदकर और मजदूरी करके परिवार चलाते थे. इन हालातों के बीच भी शरण ने बड़े सपने देखना नहीं छोड़ा. उनकी कहानी बताती है कि परिस्थितियां कठिन हो सकती हैं, लेकिन हौसला रास्ता बना सकता है.
शरण कांबले का बचपन महाराष्ट्र के सोलापुर में बेहद सामान्य परिस्थितियों में बीता. एक वीडियो इंटरव्यू में उन्होंने अपने संघर्ष के बारे में बताया था. उनके घर में बिजली की सुविधा नहीं थी और वह कच्चे मकान में रहते थे. स्कूल जाने के लिए कई बार उन्हें मीलों पैदल चलना पड़ता था. कभी-कभी बस की छत पर सफर करके भी उन्हें स्कूल पहुंचना पड़ता था. इन मुश्किलों के बावजूद पढ़ाई के प्रति उनका लगाव बना रहा.
परिवार की आर्थिक स्थिति मजबूत नहीं थी. शरण के पिता गटर खोदने और मजदूरी जैसे काम करते थे. घर चलाने के लिए उनकी मां ने खेत से सब्जियां लाकर बेचने का काम शुरू किया. शरण भी पढ़ाई से समय निकालकर मां के साथ सब्जी बेचने जाते थे. कम उम्र में जिम्मेदारियों का सामना करने के बावजूद उन्होंने शिक्षा को पीछे नहीं छोड़ा. यही संघर्ष आगे चलकर उनके आत्मविश्वास और मेहनत की बड़ी वजह बना.
शरण ने अपनी पढ़ाई जारी रखी और छात्रवृत्ति हासिल कर बीटेक की पढ़ाई पूरी की. कॉलेज में उन्होंने ऐसे छात्रों को देखा, जिनके पास बेहतर संसाधन और अंग्रेजी का अच्छा ज्ञान था. इसके बावजूद उन्होंने खुद को उनसे कम नहीं समझा. लगातार मेहनत और पढ़ाई के दम पर वह अपनी कक्षा के टॉपर्स में शामिल हुए. उनकी यह उपलब्धि उनके लिए आगे बढ़ने की प्रेरणा बनी और उन्होंने बड़े लक्ष्य की ओर कदम बढ़ाया.
बीटेक के बाद शरण के सामने करियर का एक बड़ा अवसर आया. उन्हें एक प्रतिष्ठित कंपनी में 20 लाख रुपये के पैकेज वाली नौकरी का प्रस्ताव मिला. परिवार और आसपास के लोगों के लिए यह एक शानदार मौका था. लेकिन शरण के मन में देश सेवा का सपना था. उन्होंने नौकरी के बजाय यूपीएससी की तैयारी का फैसला किया. इसके बाद उन्होंने सिविल सेवा परीक्षा को अपना लक्ष्य बनाया और तैयारी में जुट गए.
यूपीएससी की राह में शरण ने पहले सीपीएफ परीक्षा में सफलता हासिल की. साल 2019 में उन्होंने यूपीएससी सीपीएफ परीक्षा में ऑल इंडिया रैंक 8 प्राप्त की. यह उपलब्धि उनके लिए बड़ी कामयाबी थी और इससे सिविल सेवा के लक्ष्य को लेकर उनका आत्मविश्वास और मजबूत हुआ. इसके बाद उन्होंने यूपीएससी सिविल सेवा परीक्षा की तैयारी जारी रखी और अपने अंतिम लक्ष्य की ओर बढ़ते रहे.
साल 2020 में शरण कांबले ने यूपीएससी सिविल सेवा परीक्षा पास की और 542वीं रैंक हासिल की. इसके बाद वह आईपीएस अधिकारी बने. उनकी यूपीएससी यात्रा में इंटरव्यू के कई चरण भी आए. उपलब्ध जानकारी के अनुसार, उन्होंने तीन बार इंटरव्यू दिए और तीसरे प्रयास में यूपीएससी आईएफएस में 127वीं रैंक हासिल की. गटर खोदने वाले पिता और सब्जी बेचने वाली मां के साथ संघर्ष से शुरू हुआ सफर आखिरकार अफसर बनने के मुकाम तक पहुंचा.