नई दिल्ली: सफलता की राह हमेशा आसान नहीं होती और मध्य प्रदेश के जबलपुर में नगर पुलिस अधीक्षक सोनू कुर्मी की कहानी इसका उदाहरण है. किसान परिवार में जन्मे सोनू ने बचपन से आर्थिक तंगी देखी. पढ़ाई के लिए उन्हें रोज 10 से 12 किलोमीटर तक पैदल चलना पड़ता था. खेतों में परिवार का हाथ बंटाने के साथ उन्होंने पढ़ाई जारी रखी. बीमारी, असफलता और मानसिक तनाव के दौर ने उन्हें कई बार तोड़ा, लेकिन उन्होंने दोबारा खुद को संभाला और मंजिल हासिल की.सोनू कुर्मी मध्य प्रदेश के सागर जिले के छोटे से गांव गिदवानी के रहने वाले हैं. परिवार की आर्थिक स्थिति ऐसी नहीं थी कि वह महंगी कोचिंग ले सकें. उनके पिता चाहते थे कि बेटा डॉक्टर बने, इसलिए उन्होंने प्री-मेडिकल परीक्षा की तैयारी की. पढ़ाई के लिए इंदौर जाने के बाद परिस्थितियां उनके पक्ष में नहीं रहीं. बीमारी के कारण पढ़ाई बीच में छूट गई और असफलता ने उन्हें गहरे मानसिक तनाव में डाल दिया.
गांव में स्कूल की सुविधा नहीं होने के कारण सोनू को बचपन में ही मेहनत और संघर्ष का मतलब समझ आ गया था. वह रोज कई किलोमीटर पैदल चलकर स्कूल जाते थे. घर लौटने के बाद परिवार के साथ खेतों में भी काम करते थे.किसान परिवार की जिम्मेदारियों के बीच पढ़ाई जारी रखना उनके लिए आसान नहीं था. फिर भी उन्होंने शिक्षा को अपनी जिंदगी बदलने का सबसे मजबूत रास्ता माना और आगे बढ़ने का प्रयास जारी रखा.
सोनू के पिता उन्हें डॉक्टर बनाना चाहते थे. इसी सपने को पूरा करने के लिए उन्होंने प्री-मेडिकल परीक्षा की तैयारी शुरू की और इसके लिए इंदौर चले गए.वहां का माहौल और सीमित संसाधन उन्हें परेशान करने लगे. लगातार कोशिश के बावजूद वह उम्मीद के मुताबिक प्रदर्शन नहीं कर पाए. इसी दौरान उन्हें पीलिया हो गया और पढ़ाई छोड़कर घर वापस लौटना पड़ा. एक साल की मेहनत बेकार जाने से वह बेहद निराश हो गए.
असफलता के बाद सोनू को आसपास के लोगों की बातें भी सुननी पड़ीं. उन्हें ताने दिए गए और उनकी कोशिशों का मजाक उड़ाया गया. यह दौर उनके लिए बेहद कठिन था.उन्होंने बताया कि उस समय वह मानसिक रूप से काफी परेशान हो गए थे और जिंदगी खत्म करने जैसे विचार भी आने लगे थे. हालांकि परिवार का साथ उन्हें इस मुश्किल दौर से बाहर निकालने में मददगार साबित हुआ.
मेडिकल क्षेत्र का सपना टूटने के बाद सोनू ने सागर के एक कॉलेज में बी-फार्मा में दाखिला लिया. पढ़ाई के साथ उन्होंने सरकारी नौकरी की तैयारी शुरू कर दी.उनके पास महंगी कोचिंग लेने के लिए पैसे नहीं थे. इसलिए उन्होंने कॉलेज की पुस्तकालय में घंटों पढ़ाई की और इंटरनेट की मदद से खुद अध्ययन सामग्री तैयार की. इसी दौरान उनके मन में राज्य सिविल सेवा के जरिए प्रशासनिक सेवा में जाने का विचार मजबूत हुआ.
सोनू ने मध्य प्रदेश सिविल सेवा परीक्षा की तैयारी के दौरान बेहद कठिन दिनचर्या अपनाई. वह लंबे समय तक पढ़ाई करते और उपलब्ध संसाधनों का अधिकतम इस्तेमाल करते थे.पहली कोशिश में उन्हें सफलता नहीं मिली, लेकिन उन्होंने अपनी गलतियों को समझा और तैयारी में बदलाव किया. इसके बाद मध्य प्रदेश लोक सेवा आयोग की 2015 की परीक्षा में 18वीं रैंक हासिल कर उन्होंने पुलिस उपाधीक्षक का पद पाया. सोनू की कहानी बताती है कि साधन कम होने का मतलब यह नहीं कि सपने भी छोटे कर लिए जाएं. खेतों में काम करने से लेकर पुलिस उपाधीक्षक की जिम्मेदारी संभालने तक का उनका सफर लगातार मेहनत, असफलता से सीखने और परिवार के सहयोग की मिसाल है.