Neeraj Kumar Singh Inspiring Journey: कभी-कभी जिंदगी में मेहनत का परिणाम उस वक्त सामने आता है, जब इंसान उसकी उम्मीद छोड़ चुका होता है. डॉ. नीरज कुमार सिंह की कहानी भी कुछ ऐसी ही है. वाराणसी जिले के पुराशिव गांव से निकलकर उन्होंने काशी हिंदू विश्वविद्यालय में पढ़ाई की, शोध किया और कॉलेजों में अध्यापन का अनुभव हासिल किया. इस दौरान उन्हें नौकरी मिलने के साथ उसे खोने का दर्द भी झेलना पड़ा. लेकिन मुश्किलों के बीच उन्होंने पढ़ाने और आगे बढ़ने का सपना नहीं छोड़ा.
डॉ. नीरज कुमार सिंह मूल रूप से वाराणसी जिले के पुराशिव गांव के निवासी हैं. उनकी शुरुआती पढ़ाई गांव के सरकारी स्कूल में हुई. उन्होंने कक्षा एक से 12वीं तक यूपी बोर्ड से शिक्षा हासिल की. इसके बाद उन्होंने काशी हिंदू विश्वविद्यालय में बीए में प्रवेश लिया और वहीं से एमए की पढ़ाई पूरी की. विश्वविद्यालय की प्रवेश परीक्षा में उन्हें 24वीं रैंक मिली थी. गांव से निकलकर उच्च शिक्षा तक पहुंचने का उनका सफर आगे की उपलब्धियों की नींव बना.
एमए पूरा करने के बाद उसी वर्ष उन्होंने कंबाइंड रिसर्च एंट्रेंस टेस्ट (CRET) के जरिए पीएचडी में दाखिला लिया. पांच भाषाओं की जानकार डॉ. अनुराधा बनर्जी के मार्गदर्शन में उन्होंने विद्याधर सूरजप्रसाद नाइपॉल पर शोध किया. पीएचडी के बाद महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ में करीब आठ महीने तक गेस्ट फैकल्टी के रूप में पढ़ाया. फिर इलाहाबाद के चौधरी महादेव प्रसाद कॉलेज में कॉन्ट्रैक्चुअल फैकल्टी के नौ उम्मीदवारों में से उनका चयन हुआ. यहां उन्होंने लगभग डेढ़ साल काम किया और विभागाध्यक्ष के साथ एक किताब भी प्रकाशित की.
कॉलेज में काम के दौरान नीरज के करियर को आगे बढ़ने का मौका मिला था, लेकिन कोरोना महामारी के कारण उनकी नौकरी चली गई. इससे उनके सामने आजीविका का संकट खड़ा हो गया. इसी बीच 2015 में दी गई प्रवक्ता भर्ती परीक्षा का परिणाम उनके जीवन में अप्रत्याशित मोड़ लेकर आया. 2020 में लोक सेवा आयोग से इंटरव्यू का ईमेल मिलने के बाद उन्हें तैयारी के लिए सिर्फ 13 दिन मिले. उन्होंने इस कम समय का पूरा इस्तेमाल किया और उत्तर प्रदेश में तीसरी रैंक हासिल कर अपनी पहली बड़ी सरकारी सफलता दर्ज की.
राजकीय इंटर कॉलेज में चयन के बाद डॉ. नीरज ने बहराइच में करीब डेढ़ वर्ष तक अंग्रेजी प्रवक्ता के रूप में काम किया. इस दौरान उन्होंने उच्चतर शिक्षा सेवा चयन आयोग (UPHESC) की प्रोफेसर पद से जुड़ी लिखित परीक्षा भी पास की और इंटरव्यू में सफल रहे. उन्होंने जननायक चंद्रशेखर विश्वविद्यालय, बलिया की भर्ती प्रक्रिया में भी सफलता हासिल की. अगस्त 2022 से वह विश्वविद्यालय के अंग्रेजी विभाग में सहायक आचार्य के रूप में कार्यरत हैं. उनकी उपलब्धि बताती है कि कठिन परिस्थितियों के बावजूद निरंतर प्रयास नए रास्ते खोल सकते हैं.