क्या है 'ट्रिपल H'? खामेनेई की मौत के बाद अब खत्म होगा इसका दौर; इजरायल को मिल सकती बड़ी ताकत

खामेनेई के बारे में किए गए दावों के बाद ट्रिपल यानी हमास, हूथी और हिजबुल्लाह के कमजोर होने की चर्चा बढ़ रही है. एक्सपर्ट्स का मानना ​​है कि इससे मिडिल ईस्ट में इजरायल की स्ट्रेटेजिक पोजीशन मजबूत हो सकती है.

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Km Jaya

नई दिल्ली: ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्ला खामेनेई भी इजराइल और अमेरिका के हमलों में मारे गए. खामेनेई की मौत के साथ ही ईरान में 47 साल का इस्लामिक राज खत्म हो गया है. अब ऐसी चर्चा है कि ईरान में सिर्फ US के सपोर्ट वाली सरकार ही सत्ता संभाल सकती है. ऐसे अंदाजे हैं कि ईरान के क्राउन प्रिंस रेजा पहलवी, जो अमेरिका में रहते हैं, अब सत्ता संभालेंगे. 

इस बीच एक्सपर्ट्स अंदाजा लगा रहे हैं कि खामेनेई की मौत के बाद ईरान में क्या बदलेगा. इजराइल एक सुपरपावर के तौर पर उभर सकता है. ऐसा इसलिए है क्योंकि ईरानी सेना के सपोर्ट वाले मिलिटेंट ग्रुप हमास, हूती और हिजबुल्लाह अब कमजोर हो जाएंगे. 

क्या इन तीनों ग्रुप्स को ईरान का मिलता है सपोर्ट?

माना जाता है कि ईरान ने इन तीनों ग्रुप्स को सपोर्ट किया है और इनके जरिए वह मिडिल ईस्ट में इजरायल और यूनाइटेड स्टेट्स जैसी ताकतों का मुकाबला कर पाया है. इसके अलावा यह सऊदी अरब और तुर्की के खिलाफ शिया इस्लाम का एक मजबूत रिप्रेजेंटेटिव रहा है. अब जब ईरान में US सपोर्ट वाली सरकार का रास्ता साफ हो रहा है, तो यह साफ है कि इन तीनों ऑर्गनाइजेशन का दबदबा भी कम हो जाएगा.

ईरान ने मिडिल ईस्ट के तीन देशों पर कैसे बनाया कंट्रोल?

दिलचस्प बात यह है कि इन तीनों ऑर्गनाइजेशन के जरिए ईरान ने मिडिल ईस्ट के तीन देशों पर अपना कंट्रोल बनाए रखा है. उदाहरण के लिए हूती विद्रोहियों की वजह से ईरान का यमन पर कब्जा है. इसी तरह हिजबुल्लाह लेबनान में एक्टिव रहा है और इजरायल के लिए सिरदर्द बना हुआ है. ईरान गाजा और वेस्ट बैंक में एक्टिव एक टेररिस्ट ऑर्गनाइजेशन हमास को भी सपोर्ट करता है. 

ऐसे में अब जब ईरान में इस्लामिक शासन खत्म हो रहा है, तो ये तीनों ऑर्गनाइजेशन, जो उसके सपोर्ट पर डिपेंडेंट रहे हैं, वह भी कमजोर हो जाएंगे. इस स्थिति का सीधा फायदा इस इलाके में इजरायल को होगा और वह एक सुपरपावर के तौर पर उभरेगा.

कौन - कौन देश हैं अमेरिका के साथी?

सऊदी अरब, यूनाइटेड अरब अमीरात, बहरीन और कतर जैसे कई इस्लामिक देश लंबे समय से अमेरिका के साथी रहे हैं. इससे वे इजराइल के करीब आए हैं, जिससे उनकी दुश्मनी कम हुई है. ईरान अकेला बड़ा देश रहा है जिसने खुलकर इजराइल का विरोध किया है. अब वहां सरकार बदलने से इजराइल का दबदबा बढ़ेगा. इस तरह हालात एक झटके में इजराइल के लिए फायदेमंद होते दिख रहे हैं. 

उसने पहले ही कई मुस्लिम देशों के साथ अब्राहम समझौते पर साइन कर लिए हैं. नतीजतन, इजराइल का विरोध करने वाले मुस्लिम देश कम हो जाएंगे. इस तरह दबाव में भी इजराइल की ताकत और स्वीकार्यता बढ़ रही है.