सिंधु जल संधि पर क्यों 'तिलमिलाया' पाकिस्तान? ऑपरेशन सिंदूर के बाद भारत के फैसले का पूरा गणित समझिए

पहलगाम आतंकी हमले के बाद भारत ने ऑपरेशन सिंदूर के तहत सिंधु जल संधि को स्थगित कर पाकिस्तान पर रणनीतिक दबाव बढ़ा दिया है, आखिर यह संधि क्या है, भारत ने ऐसा कदम क्यों उठाया, पाकिस्तान इसे लेकर इतना चिंतित क्यों है और इस पूरे विवाद में विश्व बैंक की भूमिका क्या हो सकती है? यहां आपको इन सभी सवालों का आसान जवाब मिल सकता है.

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Shanu Sharma

'भैंस के आगे बीन बजाए, भैंस खड़ी पगुराए', यह कहावत पड़ोसी मुल्क पाकिस्तान पर सटीक बैठती  है. बार-बार चेतावनी मिलने के बाद भी पाकिस्तान हमेशा से कुछ ऐसा करता रहा है जो भारत के खिलाफ हो. उनमें से एक घटना पहलगाम हमला भी है. हालांकि पाकिस्तान की ये आदत अब उन पर भारी पड़ रही है. इस हमले के जवाब में भारत की ओर से ऑपरेशन सिंदूर शुरू किया गया, जो अब भी जारी है.

भारत की ओर से ऑपरेशन सिंदूर के तहत कड़ा रुख अपनाते हुए संधि को स्थगित कर दिया गया. ऐसा करने से पहले पाकिस्तान को कई बार भारत की ओर से समझौते में संशोधन और आतंकवाद पर बातचीत का मौका दिया गया था, लेकिन पाकिस्तान बात करने के लिए तैयार नहीं था.

ऑपरेशन सिंदूर के तहत समझौता स्थगित

ऑपरेशन सिंदूर के तहत जब भारत ने इस जल समझौते को स्थगित किया तब भी पाकिस्तान अकड़ में ही था. लेकिन जब स्थिति बिगड़ने लगी तो उसी पाकिस्तान के बोल बदलने लगे. पाकिस्तान सरकार ने इसे 24 करोड़ से ज्यादा पाकिस्तानियों के खिलाफ बताते हुए दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींचने की कोशिश की है. ऐसे में अब यह समझना जरूरी है कि क्या है यह समझौता और क्या भारत इस पर एकतरफा फैसला ले सकता है? सवाल यह भी है कि इस मुद्दे पर अंतरराष्ट्रीय अदालत पाकिस्तान की कितनी मदद कर सकती है और विश्व बैंक की इसमें क्या भूमिका हो सकती है? इस पूरे मुद्दे को हम एक-एक सवाल के जरिए समझने की कोशिश करेंगे.


क्या है सिंधु जल समझौता?

सबसे पहले हम उस नदी के बारे में बताएंगे, जिसे लेकर यह समझौता किया गया था. सिंधु संधि कुल 6 नदियों को मिलकर मिलकर बनी है, जिसमें सिंधु, रावी, चिनाब, झेलम, ब्यास और सतलुज हैं. जब भारत और पाकिस्तान का बंटवारा हो रहा था तो नदियों को लेकर भी विवाद शुरू हो गया. भारत के पंजाब और पाकिस्तान के सिंध प्रांत के बीच बहने वाली नदियों को लेकर विवाद शुरू हो गया. इस विवाद को सुलझाने के लिए भारत और पाकिस्तान के इंजीनियरों के बीच 'स्टैंडस्टिल समझौता' हुआ.

जिसके तहत पाकिस्तान को दो मुख्य नहरों के माध्यम से पानी देते रहने का फैसला किया गया. हालांकि यह समझौता ज्यादा दिनों तक नहीं चला और 1948 में ही खत्म हो गया. इसके बाद 1951 से लेकर 1960 तक विश्व बैंक की मध्यस्थता में दोनों देशों के बीच पानी बंटवारे की बात चली. इस बातचीत के निष्कर्ष में इंडस वॉटर ट्रीटी यानी सिंधु जल संधि पर हस्ताक्षर किए गए. भारत की ओर से प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू और पाकिस्तान के राष्ट्रपति अयूब खान ने इस पर हस्ताक्षर किए. लेकिन अब सवाल यह है कि भारत इसपर अकेले कैसे फैसला ले लिया.

क्या है भारत और पाकिस्तान के पास ऑप्शन?

आपको बता दें कि भारत ने इस समझौते को खत्म नहीं किया बल्कि ऑपरेशन सिंदूर के तहत एबेयंस (Abeyance)कर दिया. जिसका मतलब है कि यह समझौता अभी औपचारिक रूप से खत्म नहीं हुआ है, बल्कि इसका सामान्य संचालन फिलहाल रोक दिया गया है. पाकिस्तान इस समझौते के स्थगित होने से क्यों 'बौखलाया' हुआ है? ऐसा इसलिए क्योंकि पाकिस्तान में खेती के लिए 90 प्रतिशत पानी सिंधु नदी प्रणाली से ही मिलता है. अब पानी नहीं मिलने पर अनाज उत्पादन, बिजली उत्पादन और रोजगार के अवसर पर असर पड़ रहा है.

हालांकि आपको बता दें कि इस समझौते के तहत 6 नदियों का भी बंटवारा हुआ था. जिसमें सिंधु, झेलम और चिनाब पर पाकिस्तान का और रावी, ब्यास और सतलुज पर भारत का पूर्ण उपयोग अधिकार है. लेकिन अगर यह समझौता ज्यादा दिनों के लिए एबेयंस में रहता है तो यह मुद्दा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उठ सकता है. जिसके लिए पाकिस्तान को अब इंसानियत याद आने लगी है. हालांकि भारत के पास भी इस समझौते में बदलाव करने का हक है. अगर यह मुद्दा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उठता है तो दोनों देशों के पास कानूनी और रणनीतिक विकल्प मौजूद हैं और क्योंकि 1960 में विश्व बैंक की मध्यस्थता में इस समझौते पर साइन किया गया था तो विवाद बढ़ने पर इसे फिर से सुलझाने में मदद कर सकता है,