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India Daily

'उन्होंने दो बार चेतावनी दी थी...', ईरानी युद्धपोत के डूबने से पहले नाविक की आखिरी पुकार; कमांडर की जिद और 87 मौतों का खौफनाक सच

अमेरिकी पनडुब्बी द्वारा ईरानी युद्धपोत IRIS देना को डुबोने के बाद खाड़ी में भीषण तनाव व्याप्त है. ईरान ने जवाबी कार्रवाई में अमेरिकी ठिकानों पर मिसाइलें और ड्रोन दागकर युद्ध की स्थिति पैदा कर दी है.

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'उन्होंने दो बार चेतावनी दी थी...', ईरानी युद्धपोत के डूबने से पहले नाविक की आखिरी पुकार; कमांडर की जिद और 87 मौतों का खौफनाक सच
Courtesy: Social Media

नई दिल्ली: अमेरिकी पनडुब्बी द्वारा ईरानी युद्धपोत IRIS देना को टॉरपीडो से डुबोना सैन्य इतिहास की बड़ी और विनाशकारी घटना है. 4 मार्च को हुए इस प्रहार में 87 नाविक मारे गए. यह द्वितीय विश्व युद्ध के बाद अमेरिकी पनडुब्बी द्वारा किया गया पहला ऐसा प्रहार है. ईरान ने अब अमेरिकी सैन्य ठिकानों पर मिसाइलें दागकर प्रतिशोध शुरू किया है, जिससे पश्चिम एशिया में युद्ध का भीषण खतरा बढ़ गया है.

एक नाविक ने डूबने से पहले पिता को फोन कर बताया कि अमेरिकी पनडुब्बी ने जहाज खाली करने की दो चेतावनियां दी थीं. लेकिन कमांडर ने निकासी की अनुमति नहीं दी. चालक दल में विवाद के बीच टॉरपीडो ने जहाज को नष्ट कर दिया. लाइफबोट से भागने वाले 32 नाविक ही बच सके. बाकी नाविक समुद्र की गहराई में जहाज के साथ समा गए.

श्रीलंकाई तट पर खूनी तबाही 

अमेरिकी रक्षा सचिव ने इसे 'शांत मौत' करार दिया है. श्रीलंकाई बचाव दलों ने समुद्र से 87 शव बरामद किए हैं. IRIS देना विशाखापत्तनम में आयोजित 'अभ्यास मिलन' से लौट रहा था. लेकिन गाले तट के पास यह टॉरपीडो का शिकार हो गया. विशेषज्ञों का मानना है कि इस प्रहार ने युद्ध को हमारे समुद्री प्रवेश द्वार तक पहुंचा दिया है, जो चिंताजनक है.

ईरान का प्रचंड प्रतिशोध 

ईरान ने हमले को 'समुद्री अत्याचार' बताते हुए प्रतिशोध की लहर शुरू की है. ईरानी नौसेना ने कुवैत और यूएई स्थित अमेरिकी ठिकानों पर भीषण ड्रोन और मिसाइल हमले किए हैं. रिपोर्टों के अनुसार कुवैत पर 178 मिसाइलें और यूएई पर 1000 से अधिक ड्रोन दागे गए हैं. ईरान का कहना है कि अमेरिका को अब अपने इस सैन्य कृत्य पर भारी पछतावा होगा.

कूटनीतिक तनाव और दबाव की जंग 

इस सैन्य हमले ने कूटनीतिक संकट भी गहरा दिया है. अमेरिका ने श्रीलंका को आदेश दिया है कि वह जीवित बचे नाविकों को ईरान वापस न भेजे. इस दबाव ने श्रीलंकाई सरकार की मुश्किलें बढ़ा दी हैं. हिंद महासागर में बढ़ते तनाव को विशेषज्ञ वैश्विक सुरक्षा के लिए बुरा संकेत मान रहे हैं. अब कूटनीतिक स्तर पर शांति की संभावनाएं काफी कम बची हैं.