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अमेरिका ने जमात-ए-इस्लामी को लगाया गले? भारत के सीने पर छुरा! जानिए ढाका में सीक्रेट मीटिंग की हकीकत

बांग्लादेश में 12 फरवरी को होने वाले आम चुनाव से पहले अमेरिकी डिप्लोमैट और जमात-ए-इस्लामी नेताओं के बीच बंद कमरे की बैठक ने नई सियासी बहस छेड़ दी है.

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Edited By: Reepu Kumari
अमेरिका ने जमात-ए-इस्लामी को लगाया गले? भारत के सीने पर छुरा! जानिए ढाका में सीक्रेट मीटिंग की हकीकत
Courtesy: Pinterest

नई दिल्ली: बांग्लादेश में आम चुनाव की तारीख जैसे-जैसे नजदीक आ रही है, वैसे-वैसे वहां का सियासी माहौल भी तेज़ी से बदल रहा है. इस बार चर्चा के केंद्र में इस्लामी पार्टी जमात-ए-इस्लामी है, जिसे लेकर आकलन किया जा रहा है कि वह चुनाव में अहम भूमिका निभा सकती है. इसी बीच ढाका में तैनात एक अमेरिकी डिप्लोमैट की जमात नेताओं के साथ हुई कथित बंद कमरे की मुलाकात ने नए सवाल खड़े कर दिए हैं.

अमेरिकी अखबार द वॉशिंगटन पोस्ट की रिपोर्ट के अनुसार यह संपर्क ऐसे समय पर हुआ है, जब बांग्लादेश की राजनीति संक्रमण के दौर से गुजर रही है. रिपोर्ट में दावा किया गया है कि अमेरिकी राजनयिक ने जमात के साथ संबंध बनाने की बात कही. इस पहल को केवल चुनावी नजरिए से नहीं, बल्कि क्षेत्रीय रणनीति के बड़े संकेत के तौर पर देखा जा रहा है, जिसका असर पड़ोसी देशों तक महसूस किया जा सकता है.

चुनावी गणित में जमात की बढ़ती भूमिका

कई सर्वेक्षणों और जनमत अध्ययनों में संकेत मिले हैं कि जमात-ए-इस्लामी इस बार पिछले चुनावों की तुलना में बेहतर प्रदर्शन कर सकती है. कुछ आकलन यह भी बताते हैं कि पार्टी बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी के करीब पहुंच रही है. अमेरिका से जुड़े थिंक टैंक इंटरनेशनल रिपब्लिकन इंस्टीट्यूट के दिसंबर सर्वे में 53 प्रतिशत लोगों ने जमात के प्रति सकारात्मक रुख दिखाया. इससे पार्टी की बदली हुई स्थिति साफ झलकती है.

अमेरिका की मंशा को लेकर बढ़ी चर्चा

रिपोर्ट के मुताबिक, अमेरिकी डिप्लोमैट ने एक बैठक में कहा कि वॉशिंगटन को उम्मीद है कि जमात इस चुनाव में बेहतर करेगी. साथ ही यह भी कहा गया कि अमेरिका चाहता है कि जमात के नेता उसके मित्र बनें. हालांकि अमेरिकी दूतावास ने इस बातचीत को रूटीन और ऑफ-द-रिकॉर्ड बताया है. बावजूद इसके, यह संकेत मिलते हैं कि अमेरिका जमात को अब नजरअंदाज करने के मूड में नहीं है.

अतीत की छाया और बदली छवि

जमात-ए-इस्लामी का इतिहास विवादों से भरा रहा है. 1971 में पाकिस्तान से बांग्लादेश की मुक्ति का विरोध करने के कारण पार्टी को लंबे समय तक आलोचना और प्रतिबंधों का सामना करना पड़ा. हाल के वर्षों में जमात ने अपनी छवि बदलने की कोशिश की है. शेख हसीना के सत्ता से हटने के बाद पार्टी भ्रष्टाचार विरोधी और कल्याणकारी एजेंडे को आगे बढ़ाकर नए मतदाताओं तक पहुंच बनाने का प्रयास कर रही है.

भारत के लिए क्यों बना सिरदर्द

भारत जमात-ए-इस्लामी को हमेशा संदेह की नजर से देखता रहा है. इसकी वजह पार्टी का पाकिस्तान समर्थक रुख और 1971 की भूमिका रही है. ऐसे में अमेरिका और जमात के बीच बढ़ता संवाद भारत की सुरक्षा और रणनीतिक चिंताओं को जन्म देता है. विशेषज्ञ मानते हैं कि यह घटनाक्रम पहले से संवेदनशील भारत-अमेरिका संबंधों में नई जटिलताएं जोड़ सकता है, खासकर तब जब क्षेत्रीय राजनीति पहले ही अस्थिर दौर में है.

विशेषज्ञों की चेतावनी और आगे की तस्वीर

सामरिक विशेषज्ञों का कहना है कि जमात से अमेरिका की नजदीकी भारत और अमेरिका के बीच एक और दरार का कारण बन सकती है. साउथ एशिया इंस्टीट्यूट के निदेशक माइकल कुगलमैन के अनुसार, बांग्लादेश को लेकर भारत की सबसे बड़ी चिंता लंबे समय से जमात रही है. जुलाई 2024 के छात्र आंदोलन के बाद बदले राजनीतिक हालात में यदि जमात मजबूत होकर उभरती है, तो इसका असर पूरे दक्षिण एशिया पर पड़ सकता है.