लखनऊ के इंदिरानगर स्थित रवींद्रपल्ली निवासी 75 वर्षीय रत्ना कौल साइबर ठगों के जाल में फंस गईं. 13 अगस्त को उनके पास व्हाट्सऐप कॉल आई. कॉल करने वाले ने खुद को एटीएस अधिकारी बताया और उन पर मानव तस्करी तथा मनी लांड्रिंग गिरोह से जुड़े होने का आरोप लगाया. इसके बाद सीबीआई अधिकारी बनकर जेल भेजने की धमकी दी गई.
ठगों ने जांच के नाम पर उन्हें किसी से संपर्क नहीं करने को कहा. डर के कारण रत्ना ने अपनी तीन एफडी तुड़वाकर रकम बचत खाते में जमा की. इसके बाद वीडियो कॉल पर निगरानी रखते हुए उनसे 78.50 लाख रुपये अलग-अलग खातों में ट्रांसफर करा लिए गए. भरोसा कायम करने के लिए ठगों ने सुप्रीम कोर्ट और पुलिस की मुहर लगे फर्जी दस्तावेज भी भेजे.
साइबर ठगों की धमकी का असर इतना था कि 14 अगस्त की दोपहर जब रत्ना ने घर में चोरों की आहट सुनी, तब भी वह कमरे से बाहर नहीं निकलीं. उन्हें डर था कि जांच के दौरान बाहर निकलने या किसी से बात करने पर गिरफ्तारी हो सकती है. इसी दौरान चोर बाउंड्री फांदकर घर में घुसे और दूसरे कमरे में रखी अलमारी का लॉकर तोड़ दिया.
वहां से दो लाख रुपये नकद और लाखों रुपये के जेवर चोरी कर लिए. 20 अगस्त को जब रत्ना को साइबर ठगी का अहसास हुआ और उन्होंने कॉल काटी, तब दूसरे कमरे में पहुंचने पर चोरी का पता चला. उन्होंने 21 अगस्त को गाजीपुर थाने में शिकायत दर्ज कराई.
गोमतीनगर के विश्वासखंड निवासी 69 वर्षीय रिटायर मर्चेंट नेवी कैप्टन मोहन लाल आहूजा भी इसी तरह के जाल में फंस गए. ठगों ने खुद को दिल्ली पुलिस, एटीएस और ईडी का अधिकारी बताकर उन्हें पांच दिन तक वीडियो कॉल पर निगरानी में रखा. आरोपियों ने उनके नाम से अवैध सिम और डेबिट कार्ड जारी होने की बात कही और गिरफ्तारी का डर दिखाया.
बाद में सुप्रीम कोर्ट से कार्रवाई रुकवाने के नाम पर रकम जमा कराने को कहा गया. 20 अगस्त को उनसे दो अलग-अलग खातों में 52 लाख रुपये ट्रांसफर करा लिए गए. ठगी का अहसास होने के बाद उन्होंने साइबर क्राइम थाने में शिकायत की. अपर पुलिस उपायुक्त अपराध किरन यादव ने स्पष्ट किया कि कोई भी पुलिस या जांच एजेंसी किसी व्यक्ति को डिजिटल अरेस्ट नहीं करती. ऐसे मामलों में डरने के बजाय तुरंत परिवार को जानकारी देनी चाहिए.