नई दिल्ली: बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों की सुरक्षा एक बार फिर चर्चा के केंद्र में है. 'बांग्लादेश जातीय हिंदू महाजोते' द्वारा जारी ताजा आंकड़ों के अनुसार. पिछले कुछ दिनों में सांप्रदायिक हिंसा और आपराधिक घटनाओं में दो हिंदुओं की जान चली गई है. वहीं कुमिला शहर के एक मंदिर में हुए देसी बम विस्फोट ने श्रद्धालुओं में भारी दहशत पैदा कर दी है. इन घटनाओं ने न केवल स्थानीय स्तर पर बल्कि अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार समूहों को भी इस मुद्दे पर सक्रिय कर दिया है.
कुमिला शहर के दक्षिण ठाकुरपारा इलाके में स्थित कालीगाछ ताला काली मंदिर में शनिवार शाम उस समय अफरातफरी मच गई. जब शनि देव की पूजा के दौरान सांप्रदायिक तत्वों ने देसी बम फेंका. इस विस्फोट में मंदिर के पुजारी केशब चक्रवर्ती सहित चार लोग गंभीर रूप से घायल हो गए. प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार धमाके के बाद पूरा इलाका धुएं से भर गया और लोगों में जान बचाने की होड़ मच गई. इसके तुरंत बाद हमलावरों ने पास के एक बौद्ध मंदिर पर भी बम फेंकने की कोशिश की.
मंदिर समिति के अनुसार सीसीटीवी फुटेज में एक नकाबपोश व्यक्ति विस्फोट से ठीक पहले मंदिर में प्रवेश करता हुआ और वहां एक संदिग्ध बैग छोड़कर जाता हुआ दिखाई दे रहा है. इस हमले की पुष्टि स्थानीय पुलिस स्टेशन के प्रभारी अधिकारी तौहिदुल अनवर ने भी की है. घायल पुजारी का फिलहाल अस्पताल में इलाज चल रहा है. इस घटना के बाद कुमिला के पुलिस अधीक्षक और बम निरोधक दस्ते ने घटनास्थल का मुआयना कर जांच तेज कर दी है. स्थानीय प्रशासन ने शांति बनाए रखने की अपील की है.
हत्या की पहली घटना 6 मार्च को बोगुरा जिले के सरियाकंडी में सामने आई. यहां 40 वर्षीय चायोन राजभर की जमीन विवाद के चलते बदमाशों ने चाकू मारकर हत्या कर दी. चायोन राजभर एक स्थानीय कोचिंग सेंटर के निदेशक थे और समाज में काफी सक्रिय थे. मानवाधिकार समूह के बयान के अनुसार इस तरह की लक्षित हत्याओं से हिंदू समुदाय में असुरक्षा की भावना बढ़ रही है. पुलिस इस मामले में आरोपियों की तलाश कर रही है, लेकिन अब तक कोई बड़ी गिरफ्तारी नहीं हो सकी है.
कॉक्स बाजार में एक और दुखद घटना हुई. यहां 29 वर्षीय गणेश पाल नामक युवक को सांप्रदायिक आतंकवादियों ने मौत के घाट उतार दिया. रिपोर्टों के अनुसार गणेश से मोटी फिरौती की मांग की गई थी और जब उन्होंने अपनी आर्थिक स्थिति का हवाला देकर पैसे देने से इनकार कर दिया, तो उन्हें चाकू मार दिया गया. फिरौती और जबरन वसूली की ये घटनाएं अब अल्पसंख्यकों के लिए जानलेवा साबित हो रही हैं, जिससे प्रशासन की मुस्तैदी पर सवाल उठ रहे हैं.