नई दिल्ली: पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था इन दिनों लगातार मुश्किलों का सामना कर रही है. अब उसे एक और बड़ा झटका लगा है. संयुक्त अरब अमीरात (UAE) ने पिछले सात सालों में पहली बार पाकिस्तान के 3 अरब डॉलर के कर्ज को आगे बढ़ाने यानी रोलओवर करने से मना कर दिया है.
यह राशि पाकिस्तान के कुल विदेशी मुद्रा भंडार का करीब 18 प्रतिशत है. 27 मार्च तक देश का विदेशी मुद्रा भंडार 16.4 अरब डॉलर था, जो मुश्किल से तीन महीने के आयात को ही कवर कर पाता है. कर्ज चुकाने के बाद यह स्थिति और कमजोर हो जाएगी. कच्चे तेल की ऊंची कीमतों के कारण पहले से दबाव में चल रही अर्थव्यवस्था अब और संकट में फंस गई है. IMF की अगली किस्त भी अभी तक नहीं आई है.
3 अरब डॉलर का यह कर्ज पाकिस्तान के विदेशी मुद्रा भंडार का बड़ा हिस्सा है. इसे चुकाने के बाद भंडार और घट जाएगा, जिससे देश बाहरी आर्थिक झटकों को सहने की क्षमता खो देगा. पाकिस्तान स्टॉक एक्सचेंज का मुख्य इंडेक्स KSE-100 पिछले कुछ सालों की अच्छी बढ़त के बाद अब 15 प्रतिशत नीचे आ चुका है. विशेषज्ञों का कहना है कि अगर सऊदी अरब से कोई बड़ी मदद नहीं मिली तो भंडार तेजी से घटेगा और 2026 तक 20 अरब डॉलर का लक्ष्य हासिल करना मुश्किल हो जाएगा.
UAE के इस अचानक फैसले के पीछे सही कारण अभी साफ नहीं है. पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय ने इसे सामान्य वित्तीय लेनदेन बताया है. कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि पाकिस्तान की सऊदी अरब के साथ बढ़ती निकटता का असर हो सकता है. सस्टेनेबल डेवलपमेंट पॉलिसी इंस्टीट्यूट के साजिद अमीन कहते हैं कि शायद सरकार ने महंगे ब्याज दर पर लंबा रोलओवर न मिलने के कारण कर्ज चुकाने का फैसला किया हो. शर्तों पर बातचीत भी विफल रही.
इसी महीने पाकिस्तान को 1.3 अरब डॉलर के अंतरराष्ट्रीय बॉन्ड का भुगतान भी करना है. IMF से 1.2 अरब डॉलर की अगली किस्त अभी तक नहीं मिली है. केंद्रीय बैंक को अब आयात पर सख्ती, ब्याज दर बढ़ाने या कमर्शियल बैंकों से डॉलर स्वैप जैसे कदम उठाने पड़ सकते हैं. टॉपलाइन सिक्योरिटीज के मोहम्मद सुहैल कहते हैं कि डॉलर स्वैप एक विकल्प है लेकिन IMF इसे पसंद नहीं करता.
पाकिस्तान ने पहले UAE के कुछ कर्ज को इक्विटी में बदलने की कोशिश की थी. उप प्रधानमंत्री इशाक डार ने बताया था कि UAE फौजी फाउंडेशन की कंपनियों में निवेश करने पर विचार कर रहा है. अबू धाबी की इंटरनेशनल होल्डिंग कंपनी ने पाकिस्तान के फर्स्ट वीमेन बैंक का अधिग्रहण किया है और AD पोर्ट्स ग्रुप ने कराची पोर्ट के साथ 25 साल का समझौता किया है. अगर सऊदी अरब से मदद नहीं आई तो स्थिति और बिगड़ सकती है.