नई दिल्ली: पाकिस्तान में आंतरिक सुरक्षा की स्थिति बदतर होती जा रही है. बलूच विद्रोहियों के हालिया हमलों ने शहबाज शरीफ सरकार और सेना प्रमुख जनरल मुनीर की सत्ता को हिला कर रख दिया है. मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, बलूचिस्तान लिबरेशन आर्मी (BLA) के लड़ाकों ने पाकिस्तान सेना को कई इलाकों से खदेड़ दिया है. इस विद्रोह ने न केवल स्थानीय प्रशासन को घुटनों पर ला दिया है, बल्कि अंतरराष्ट्रीय निवेश, विशेष रूप से चीनी परियोजनाओं के भविष्य पर भी बड़ा प्रश्नचिह्न लगा दिया है.
बलूचिस्तान लिबरेशन आर्मी (BLA) के लड़ाकों ने हालिया दिनों में रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण कई सैन्य शिविरों और चौकियों पर अपना झंडा फहरा दिया है. खबरों के मुताबिक, विद्रोहियों ने भीषण संघर्ष के बाद सेना को पीछे हटने पर मजबूर किया है. वर्तमान में राज्य के 10 से अधिक जिलों पर विद्रोहियों का सीधा नियंत्रण बताया जा रहा है. यह सैन्य विफलता पाकिस्तान के रक्षा तंत्र में बढ़ती दरारों और विद्रोहियों के संगठित हमलों की ओर इशारा करती है.
इस तनावपूर्ण स्थिति के बीच, ग्वादर से एक बड़ी खबर सामने आ रही है. पाकिस्तान सेना ने वहां अपने सभी महत्वपूर्ण ग्राउंड ऑपरेशंस को अस्थायी रूप से सस्पेंड कर दिया है. ग्वादर, जो कभी पाकिस्तान की आर्थिक प्रगति का केंद्र माना जाता था, अब संघर्ष के मैदान में बदल चुका है. सेना की इस वापसी ने विद्रोहियों के मनोबल को और बढ़ा दिया है, जबकि आम जनता के बीच असुरक्षा की भावना अब और गहरी होती जा रही है.
चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे (CPEC) के तहत बलूचिस्तान में चल रहे चीनी प्रोजेक्ट्स अब विद्रोहियों के मुख्य निशाने पर हैं. बलूच लड़ाके इन विदेशी निवेशों को अपनी प्राकृतिक संपदा की लूट मानते हैं. हमलों की बढ़ती तीव्रता और सुरक्षा सुनिश्चित न कर पाने की पाकिस्तानी विफलता को देखते हुए राष्ट्रपति शी जिनपिंग की सरकार ने कड़ा रुख अपनाया है. बीजिंग अब अपने नागरिकों और परियोजनाओं की सुरक्षा के लिए कड़े और स्वतंत्र फैसले लेने की तैयारी में है.
प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ और जनरल आसिम मुनीर की जोड़ी के लिए यह समय सबसे कठिन परीक्षा का है. विपक्ष और जनता सेना की रणनीतियों पर सवाल उठा रहे हैं. दस जिलों का हाथ से निकल जाना और रणनीतिक चौकियों पर विद्रोहियों का कब्जा सैन्य नेतृत्व की अक्षमता को दर्शाता है. सरकार अब अंतरराष्ट्रीय दबाव और आंतरिक कलह के बीच फंसी हुई है, जिससे शांति वार्ता या कड़े सैन्य विकल्प, दोनों ही बेहद चुनौतीपूर्ण नजर आ रहे हैं.