नई दिल्ली: संसद के उच्च सदन में राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव के दौरान विपक्ष के नेता मल्लिकार्जुन खड़गे का तेवर काफी आक्रामक नजर आया. उन्होंने वर्तमान सरकार की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाते हुए कहा कि आज देश का सामाजिक ताना-बना खतरे में है. खड़गे ने सामाजिक न्याय से लेकर विदेश नीति तक के मुद्दों पर सरकार की चुप्पी को निराशाजनक बताया.
खड़गे ने कहा कि भारत विविधताओं का देश रहा है, लेकिन अब सामाजिक सद्भाव खतरनाक दौर में है. उन्होंने उत्तराखंड में 'मोहम्मद दीपक' पर दर्ज मुकदमे का जिक्र करते हुए आरोप लगाया कि जो लोग शांति बनाने की कोशिश करते हैं, उन्हें ही धमकाया जा रहा है. उनके अनुसार, बीजेपी की राजनीति में सहिष्णुता के लिए कोई स्थान नहीं बचा है. जब रक्षक ही भक्षक बन जाए, तो आम नागरिक अपनी सुरक्षा के लिए आखिर किसके पास गुहार लगाएगा?
प्रधानमंत्री मोदी की मणिपुर यात्रा को लेकर खड़गे ने वास्को डी गामा और कोलंबस का उदाहरण दिया. उन्होंने कहा कि सदियों पहले बिना आधुनिक मार्ग के भी यात्री महीनों में भारत पहुंच जाते थे, लेकिन पीएम को दिल्ली से मणिपुर जाने में दो साल लग गए. उन्होंने सवाल किया कि क्या यही नॉर्थ-ईस्ट के प्रति सरकार की चिंता है? विपक्ष की निरंतर मांग के बावजूद इतनी बड़ी मानवीय त्रासदी पर देरी करना संवेदनहीनता की पराकाष्ठा है.
भारत-अमेरिका व्यापार समझौते पर निशाना साधते हुए उन्होंने चेतावनी दी कि भारतीय किसानों को अमेरिकी किसानों के साथ मुकाबले में उतारना आत्मघाती होगा. इससे हमारे कृषि क्षेत्र पर बहुत बुरा असर पड़ेगा. खड़गे ने भविष्यवाणी की कि सरकार के इस कदम से किसानों का आंदोलन फिर से भड़क सकता है और अंततः सरकार को पीछे हटना पड़ेगा. उन्होंने संप्रभुता पर भी सवाल उठाया और पूछा कि क्या हम अमेरिकी दबाव में काम कर रहे हैं?
विपक्ष के नेता ने राष्ट्रपति के भाषण में कई महत्वपूर्ण पहलुओं पर चुप्पी साधे जाने की बात कही. उन्होंने सदन के सामने सामाजिक न्याय, संवैधानिक संस्थानों पर हमले, लड़खड़ाती अर्थव्यवस्था और मजदूरों के संघर्ष जैसे मुद्दों को प्रमुखता से रखा. खड़गे ने कटाक्ष किया कि भले ही सरकार की वकालत अच्छी हो, लेकिन मामला इतना खराब है कि इसे जीता नहीं जा सकता. सरकार केवल अपनी नाकामियों को छिपाने के लिए शब्दों का मायाजाल बुन रही है.
महिलाओं के मुद्दे पर खड़गे ने बीजेपी को घेरते हुए कहा कि वे उनके लिए सिर्फ एक वोट बैंक बन गई हैं. उन्होंने सवाल उठाया कि सरकार महिलाओं के लिए आरक्षण लागू करने में देरी क्यों कर रही है? उन्होंने वैचारिक संगठन आरएसएस पर भी प्रहार किया और कहा कि वहां सालों से कोई महिला नेता क्यों नहीं है? सामाजिक न्याय की स्थिति उनके शासन में और भी बदतर हो गई है, जहां केवल कागजी दावे किए जा रहे हैं.