नेपाल की राजधानी काठमांडू और आसपास के जिलों में सरकार द्वारा चलाए गए अतिक्रमण हटाओ अभियान के बाद हजारों परिवार बेघर हो गए हैं. 25 अप्रैल से शुरू हुए इस अभियान के तहत भूमि पर अवैध रूप से बसे लोगों की बस्तियों को हटाया गया. सरकारी आंकड़ों के अनुसार, अब तक 2,687 मकान ढहाए गए हैं और करीब 15,300 लोग प्रभावित हुए हैं. वहीं, मानवाधिकार समूहों का दावा है कि प्रभावित लोगों की संख्या 15,000 से 20,000 के बीच हो सकती है.
नेपाल लंबे समय से भूमिहीनता और आवास संकट से जूझ रहा है. अनुमान है कि देश में 35 लाख से अधिक लोग भूमिहीन या बेघर हैं. सरकार ने पहले भूमिहीन परिवारों के पंजीकरण की प्रक्रिया शुरू की थी, जिसमें लगभग 12 लाख लोगों ने आवेदन किया था. इनमें बड़ी संख्या दलित, आदिवासी और आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों की है. मानवाधिकार संगठनों का आरोप है कि इन्हीं समुदायों को पर्याप्त नोटिस, परामर्श और वैकल्पिक आवास दिए बिना बेदखल कर दिया गया.
रिपोर्टों के अनुसार, बेदखली के दौरान बड़ी संख्या में पुलिस और सुरक्षा बलों की तैनाती की गई. प्रभावित परिवारों का आरोप है कि उन्हें धमकाया गया, हिरासत में लिया गया और कई स्थानों पर पत्रकारों तथा मानवाधिकार कार्यकर्ताओं को भी घटनास्थल तक पहुंचने से रोका गया. विस्थापित परिवारों को अस्थायी शिविरों में रखा गया, जहां भोजन, पानी और आवाजाही जैसी बुनियादी सुविधाओं को लेकर भी शिकायतें सामने आईं. बाद में सरकार ने प्रत्येक परिवार को 25,000 नेपाली रुपये की सहायता देने की घोषणा की, लेकिन आलोचकों का कहना है कि यह पुनर्वास के लिए पर्याप्त नहीं है.
इस अभियान का सबसे अधिक असर बच्चों और महिलाओं पर पड़ा है. हजारों बच्चों की पढ़ाई बाधित हुई, क्योंकि कई परिवार परीक्षा के दौरान ही अपने घरों से विस्थापित हो गए. महिलाओं को बच्चों की देखभाल, असुरक्षा और अस्थायी शिविरों में कठिन परिस्थितियों का सामना करना पड़ा. मानवाधिकार कार्यकर्ताओं का कहना है कि बिना समुचित पुनर्वास योजना के की गई कार्रवाई ने विस्थापित परिवारों की सामाजिक और आर्थिक परेशानियों को और बढ़ा दिया.
बेदखली अभियान के खिलाफ नेपाल के सर्वोच्च न्यायालय में याचिका दायर की गई थी. सुनवाई के बाद अदालत ने अंतरिम आदेश जारी करते हुए सरकार को फिलहाल बेदखली अभियान रोकने और प्रभावित लोगों को आवश्यक सेवाएं उपलब्ध कराने का निर्देश दिया. अदालत ने यह भी कहा कि भविष्य में किसी भी कार्रवाई से पहले कानूनी प्रक्रिया का पूरी तरह पालन किया जाए. मानवाधिकार संगठनों का मानना है कि नेपाल सरकार को प्रभावित समुदायों से संवाद, वैकल्पिक आवास और पुनर्वास की ठोस योजना तैयार करनी चाहिए, ताकि विकास और मानवाधिकारों के बीच संतुलन बनाया जा सके.