‘एक पर हमला तो तीनों पर वार’, सऊदी-पाकिस्तान के साथ तुर्की भी आया; बना नया गठजोड़

मक्का में तुर्की, सऊदी अरब और पाकिस्तान ने संयुक्त रक्षा समझौते पर हस्ताक्षर किए हैं. समझौते के तहत एक देश पर सशस्त्र हमला तीनों पर हमला माना जाएगा. इससे क्षेत्रीय सुरक्षा सहयोग बढ़ने की उम्मीद है.

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Kanhaiya Kumar Jha

नई दिल्ली: मक्का में शुक्रवार को पश्चिम एशिया की सुरक्षा व्यवस्था से जुड़ा एक अहम घटनाक्रम सामने आया. तुर्की, सऊदी अरब और पाकिस्तान ने मक्का जॉइंट डिफेंस एग्रीमेंट पर हस्ताक्षर किए. समझौते की सबसे अहम शर्त यह है कि तीनों में किसी एक देश पर सशस्त्र हमला होने पर उसे सभी पर हमला माना जाएगा. सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान, तुर्की के राष्ट्रपति रेसेप तैयप एर्दोआन और पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ की मौजूदगी में यह समझौता हुआ.

समझौते पर मक्का के अल-सफा पैलेस में आयोजित बैठक के दौरान हस्ताक्षर किए गए. तीनों देशों ने इसे अपने पुराने संबंधों, साझा रणनीतिक हितों और रक्षा सहयोग को आगे बढ़ाने वाला कदम बताया. आधिकारिक तौर पर इसका लक्ष्य सामूहिक सुरक्षा मजबूत करना और क्षेत्रीय शांति तथा स्थिरता को बढ़ावा देना है. यह समझौता ऐसे समय हुआ है, जब पश्चिम एशिया में सुरक्षा तनाव लगातार चिंता का विषय बना हुआ है.

एक पर हमला यानी तीनों के खिलाफ कार्रवाई

समझौते की सबसे महत्वपूर्ण व्यवस्था सामूहिक रक्षा से जुड़ी है. इसके मुताबिक किसी एक सदस्य देश के खिलाफ सशस्त्र हमला होने पर उसे तीनों देशों के खिलाफ हमला माना जाएगा. इसके साथ ही सैन्य और सुरक्षा सहयोग को व्यापक बनाने पर भी जोर दिया गया है. तीनों देश रक्षा क्षेत्र में समन्वय और सामूहिक प्रतिरोध क्षमता बढ़ाने की दिशा में काम करेंगे.


क्या इसे ‘मुस्लिम नाटो’ कहना सही है?

इस समझौते के बाद इसे कुछ जगहों पर ‘मुस्लिम नाटो’ कहा जा रहा है, लेकिन यह इसका आधिकारिक नाम नहीं है और इसे सीधे NATO जैसा संगठन मानना जल्दबाजी होगी. फिलहाल उपलब्ध जानकारी के मुताबिक यह तीन देशों के बीच संयुक्त रक्षा समझौता है. हालांकि, इसकी सामूहिक रक्षा वाली शर्त इसे सामान्य द्विपक्षीय सैन्य सहयोग से ज्यादा महत्वपूर्ण बनाती है. समझौते में भविष्य में क्षेत्रीय सहयोग के विस्तार की संभावना भी बताई गई है.

पाकिस्तान-सऊदी समझौते के बाद तुर्की की एंट्री

इस समझौते को 2025 में हुए पाकिस्तान-सऊदी अरब के रणनीतिक पारस्परिक रक्षा समझौते के अगले चरण के तौर पर भी देखा जा रहा है. उस समझौते में भी दोनों देशों ने एक-दूसरे पर होने वाली आक्रामकता को दोनों के खिलाफ माना था. अब तुर्की के जुड़ने से तीनों देशों के बीच रक्षा सहयोग का दायरा बढ़ गया है.

पश्चिम एशिया के बदलते समीकरणों पर नजर

नया समझौता ऐसे वक्त हुआ है, जब पश्चिम एशिया में सुरक्षा हालात तेजी से बदल रहे हैं. सऊदी अरब, तुर्की और पाकिस्तान की अपनी-अपनी सैन्य क्षमताएं और रणनीतिक प्राथमिकताएं हैं. इसलिए इस साझेदारी का असर केवल तीनों देशों तक सीमित नहीं रह सकता. आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि समझौते के तहत सैन्य अभ्यास, खुफिया सहयोग और रक्षा तकनीक के क्षेत्र में कितनी ठोस साझेदारी विकसित होती है.