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India Daily

मुनीर के हाथ में 'मक्का समझौता', तुर्की बैठक में तीनों देशों ने लिया फैसला; भारत की सुरक्षा पर क्या होगा असर?

पाकिस्तान, तुर्की और सऊदी अरब के बीच हुए मक्का समझौते को लेकर 31 अगस्त को इस्तांबुल में बैठक हुई. जिसमें कुछ अहम फैसले लिए गए. ऐसे में यह सवाल उठता है कि इस समझौते का भारत पर क्या असर हो सकता है?

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Edited By: Shanu Sharma
मुनीर के हाथ में 'मक्का समझौता', तुर्की बैठक में तीनों देशों ने लिया फैसला; भारत की सुरक्षा पर क्या होगा असर?
Courtesy: AI

तुर्की के इस्तांबुल में 31 अगस्त को मक्का समझौते में शामिल तीनों देश पाकिस्तान, सऊदी अरब और तुर्की की अहम बैठक हुई. रिपोर्ट के मुताबिक इस बैठक में तीनों देशों के एकजुट होकर इस रक्षा समझौता को मजबूत करने के लिए सहमत हुए.

बांग्लादेश और मिस्र को लेकर कई दिनों से यह कहा जा रहा है कि दोनों देश इस समझौते में शामिल हो सकते हैं. हालांकि इस मुद्दे पर इस्तांबुल में हुई बैठक में कोई ठोस नतीजे नहीं निकला. माना जा रहा है कि अगर ये दोनों देश इस समझौते में शामिल होते हैं तो यह समझौता भी उतना ही बेअसर होगा, जितना रावलपिंडी में हुआ पाकिस्तान-कुवैत रक्षा समझौता था. 

इस्तांबुल की बैठक में क्या-क्या हुआ?

मिली जानकारी के मुताबिक इस बैठक में तीनों देशों के विदेश मंत्री के साथ-साथ सैन्य प्रमुखों ने भी हिस्सा लिया. तीनों देशों ने मिलकर इसे एक संस्थागत ढांचे के जरिए और मजबूत करने पर बात की. साथ ही एक राजनीतिक और रक्षा समिति का गठन किया गया.  

तुर्की में हुए इस बैठक में तीनों देश समझौते के तहत सऊदी अरब में एक नया सचिवालय बनाने के लिए तैयार हुए हैं. कहा जा रहा है कि शुरुआती तीन साल के लिए इस सचिवालय का नेतृत्व पाकिस्तान करेगा, जिसका मतलब है कि सऊदी में बनाए जा रहे इस सचिवालय का पहला महासचिव पाकिस्तान से होगा.

सऊदी में बनाए जा रहे इस संस्थागत व्यवस्था के पीछे तीनों देशों के बीच आपसी तालमेल को मजबूत रखने की कोशिश कही जा रही है. साथ ही इसी सचिवालय में आगे चलकर इस समझौते के लिए आगे आए नामों पर चर्चा किया जाएगा. खबरों की मानें तो ईरान को भी इसमें शामिल होने के लिए न्योता भेजा गया है, हालांकि इसे लेकर अभी तक कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं की गई है.

कितना सफल होगा मक्का समझौता?

मक्का समझौता पाकिस्तान, सऊदी और तुर्की के बीच 7 अगस्त को फाइनल किया गया था. इसे बोल-चाल में लोग इस्लामिक नाटो भी कहते हैं. जिसका मतलब है कि इस समझौते में शामिल किसी एक देश पर हुए हमले को सभी देश के खिलाफ माना जाएगा.

तीनों देश जब इस समझौते पर हस्ताक्षर कर रहे थे तभी उन्होंने कहा था कि इस समझौते का पहला मकसद ईरान और हूती गुटों की तरफ से सऊदी की तेल रिफाइनरियों पर हो रहे हमलों को रोकना है. हालांकि इसके 48 घंटे बाद हुए हमले में उनका पहला मकसद पूरी तरह से नाकाम हो गया था. इसी दौरान हूती गुट ने सऊदी अरब के जाजान में स्थित अरामको तेल रिफाइनरी पर हमले किए थे. ऐसे में यह सवाल उठता है कि अगर यह समझौता पूरी तरह लागू होता है तो इसका असर कहां तक हो सकता है?

मक्का समझौते का भारत पर क्या होगा असर?

मक्का समझौते को अगर भारत की सुरक्षा के लिहाज से देखा जाए तो अभी तक इसे अच्छा नहीं माना जा रहा है. कहा जा रहा है कि पाकिस्तान अगर इस समझौते में बांग्लादेश को भी शामिल करता है तो भविष्य में भारत के लिए चुनौती बढ़ सकती है. यह दावा इसलिए भी किया जा रहा है क्योंकि इस समझौते की सबसे बड़ी बात यही है कि एक पर हमले का मतलब सब पर हमला माना जाएगा. यानी अगर पाकिस्तान के साथ भारत का तनाव बढ़ता है तो दूसरी ओर से बांग्लादेश भी भारत को घेरने की कोशिश कर सकता है.

हालांकि कुछ जानकारों का यह भी मानना है कि यह केवल रक्षा समझौता है इसलिए वह ऐसा नहीं करेंगे. अगर इन तीनों देशों के अभी तक के समन्वय का आकलन करें तो अलग-अलग समय पर उदाहरण देखने को मिला है. जैसे की ऑपरेशन सिंदूर के दौरान पाकिस्तान भारी मात्रा में तुर्की के हथियारों का इस्तेमाल कर रहा था, वहीं सऊदी ने इस मुद्दे पर शांत रह कर तटस्थता बनाए रखी. वहीं सऊदी अरब पर ईरानी और हूती गुटों द्वारा हमले होते रहे, ऐसे में कुछ जानकारों द्वारा इस गठबंधन से भारत के लिए जताई जा रही चिताएं बेबुनियादी बताए जा रहे हैं.