China military near space force equipped with hypersonic weapons: हांगकांग के SCMP अखबार ने हाल ही में बताया कि चीन ने अपना पहला 'नियर स्पेस कमांड' सेंटर बनाया है, जो हाइपरसोनिक हथियारों से लैस है. मतलब साफ है कि थल सेना, नौसेना, वायु सेना और रॉकेट फोर्स के अलावा पांचवीं ताकत के रूप में ‘नियर स्पेस कमांड’ से चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी तैनात होगी.
वर्ल्ड मीडिया में चीन के नियर स्पेस कमांड की चर्चा हो रही है. कुछ रिपोर्ट्स में कहा गया है कि चीन अब अंतरिक्ष के जरिए अपनी शक्ति में इजाफा करना चाहता है, तो कुछ रिपोर्ट्स में ये कहा गया है कि चीन के इस कदम ने दुनिया के कई देशों को टेंशन में डाल दिया है. आखिर नियर स्पेस कमांड क्या है और दुनिया के देशों को इसे लेकर चिंता क्यों करनी चाहिए?
दरअसल, साल 2023 के दूसरे महीने की शुरुआत में यानी 3 फरवरी को अमेरिका के मोंटाना क्षेत्र में आसमान में एक संदिग्ध गुब्बारा देखा गया. इसे लेकर अमेरिका ने चिंता जताई और आखिरकार अमेरिकी वायुसेना ने इसे अंटलांटिक महासागर में मार गिराया. जांच पड़ताल के दौरान पता चला कि ये चीन का जासूसी गुब्बारा था. इसे लेकर अमेरिका ने आपत्ति जताई. हालांकि चीन ने इस आरोप को खारिज कर दिया.
अमेरिका के बाद चीनी गुब्बारे कनाडा, जापान और हाल ही में भारत में भी देखे गए थे. उधर, चीन की ओर से हर बार जासूसी गुब्बारे भेजे जाने से इनकार के बाद भी अमेरिकी जांच जारी रही. बाद में सामने आया कि चीन ने न सिर्फ अमेरिका बल्कि 40 से ज्यादा देशों में अपने जासूसी गुब्बारे भेजे हैं. जांच में ये भी सामने आया कि चीन लगातार इन गुब्बारों के जरिए कुछ देशों की जासूसी कर रहा है.
नवंबर के तीसरे सप्ताह में चीन की एक नेशनल यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं ने दावा किया कि हमारे देश ने दुनिया की पहली नियर स्पेस कमांड यानी फोर्स बनाई है. नेशनल यूनिवर्सिटी ऑफ डिफेंस टेक्नोलॉजी के रिसर्चर्स दावा किया कि इस फोर्स में अत्याधुनिक ड्रोन, जासूसी करने वाले गुब्बारे, खतरनाक हाइपरसोनिक वैपंस शामिल हैं. यानी इस फोर्स के जरिए न सिर्फ जासूसी की जा सकती है, बल्कि इसके जरिए किसी भी देश पर हमला भी किया जा सकता है.
धरती की सतह से 20 से 100 किमी ऊपर का इलाका नियर स्पेस के नाम से जाना जाता है. 80 किलोमीटर के ऊपर 20 किलोमीटर के बाद यानी 100 किमी पर कारमन लाइन है, जहां से अंतरिक्ष शुरू हो जाता है. बता दें कि जमीन के सतह के ऊपर वायुमंडल की पांच लेयर होती है. हर लेयर को अलग-अलग ऊंचाई पर किलोमीटर के दायरे में बांट दिया गया है और इन्हें अलग-अलग नाम दिया गया है. जैसे- धरती की सतह से ऊपर 700 से 10 किलोमीटर वाले क्षेत्र को एक्सोस्फियर के नाम से जाना जाता है. इसी तरह धरती की सतह से ऊपर 12 किलोमीटर के क्षेत्र को ट्रोपोस्फियर, 12 से 50 वाले एरिया को स्ट्रैटोस्फियर, 50 से 80 वाले को मेसोस्फियर और 80 से 700 किलोमीटर वाले एरिया को थर्मोस्फियर कहा जाता है.
धरती की सतह से ऊपर 20 किलोमीटर से 100 किलोमीटर वाले एरिया में हवा की रफ्तार तेज होती है, ये समझिए कि यहां कि हवा काफी पतली होती है, इसलिए यहां कॉमर्शियल एयरक्राफ्ट और जेट नहीं उड़ाए जाते. इसी क्षेत्र को चीन अपनी ताकत बना रहा है. रिपोर्ट्स के मुताबिक, इस एरिया में ड्रोन (सूर्य की रोशनी से चलने वाला), हीलियम वाले बैलून लंबे समय तक रह सकते हैं. इसी का फायदा उठाते हुए चीन ने नियर स्पेस कमांड बनाई है, जिसका यूज जानकारी जुटाने और युद्ध की स्थिति में हापरसोनिक हथियार चलाने में किया जाएगा.
फिलहाल, चीन के पास मिलिट्री इंटेलिजेंस के लिए लगभग 260 ISR सैटेलाइट हैं. इन सैटेलाइट्स से जो डाटा मिलता है, वो न तो उतना सटीक होता है और न ही हाई डेफिनीशन इमेज मिलती है, इन कमियों को नियर स्पेस कमांड के जरिए चीन पूरा करने की कोशिश करेगा. नेशनल यूनिवर्सिटी ऑफ डिफेंस टेक्नोलॉजी के रिसर्चर्स के मुताबिक, धरती की सतह से 20 किलोमीटर से ऊपर उड़ने वाले गुब्बारों और एयरशिप्स के जरिए बेहतर क्वालिटी वाले इमेज मिलते हैं. इनके जरिए एंटी मिसाइल सिस्टम को मात दिया जा सकता है और किसी भी टारगेट पर सटीक निशाना लगाया जा सकता है.