नई दिल्ली: बलूचिस्तान का पाकिस्तान में शामिल होना आज भी इतिहास का एक विवादित अध्याय है. बलोच राष्ट्रवादी इसे जबरन विलय मानते हैं, जबकि पाकिस्तान का आधिकारिक पक्ष है कि कलात के खान ने बातचीत के बाद पाकिस्तान में शामिल होने का फैसला किया था. इस पूरे विवाद की शुरुआत पाकिस्तान बनने से पहले ही हो गई थी.
बलूचिस्तान के ऐतिहासिक क्षेत्र में कलात, खरान, लास बेला और मकरान जैसी रियासतें शामिल थीं. कलात के आखिरी खान मीर अहमद यार खान ने ब्रिटिश शासन से अलग होकर स्वतंत्र रहने का विकल्प चुना. 11 अगस्त 1947 को कलात को स्वतंत्र रियासत के रूप में मान्यता मिलने की घोषणा हुई. इसके बाद कुछ समय तक कलात ने खुद को स्वतंत्र राज्य के रूप में चलाया.
मीर अहमद यार खान ने 1946 में मोहम्मद अली जिन्ना को अपना कानूनी सलाहकार बनाया था. उनका उद्देश्य ब्रिटिश सरकार के सामने कलात की स्वायत्तता और स्वतंत्र स्थिति का पक्ष रखना था. अगस्त 1947 में कलात और मुस्लिम लीग के बीच समझौते में कलात की स्वतंत्र स्थिति को लेकर सहमति बनी थी. बलोच राष्ट्रवादी इसी घटनाक्रम को पाकिस्तान में बाद के विलय के विवाद का आधार मानते हैं.
पाकिस्तान बनने के बाद कलात के सामने पाकिस्तान में शामिल होने का दबाव बढ़ने लगा. खान ने तत्काल विलय स्वीकार नहीं किया. कलात की विधानसभा में भी पाकिस्तान में विलय के प्रस्ताव का विरोध किया गया. इस दौरान पाकिस्तान ने खरान, लास बेला और मकरान को कलात से अलग कर अपने साथ मिला लिया. इससे कलात राजनीतिक और भौगोलिक रूप से कमजोर हो गया.
मार्च 1948 में परिस्थितियां तेजी से बदलीं. पाकिस्तान ने कलात पर दबाव बढ़ाया और पाकिस्तानी सेना बलूच क्षेत्र में पहुंच गई. खान के पास सीमित विकल्प रह गए थे. पाकिस्तान के आधिकारिक रिकॉर्ड के अनुसार मीर अहमद यार खान ने 27 मार्च 1948 को विलय पत्र पर हस्ताक्षर कर कलात को पाकिस्तान में शामिल कर लिया. इसके बाद कलात की स्वतंत्र स्थिति समाप्त हो गई.
बलोच राष्ट्रवादी इस विलय को स्वैच्छिक फैसला नहीं मानते. उनका दावा है कि पाकिस्तान ने सैन्य और राजनीतिक दबाव के जरिए कलात का विलय कराया. इसी वजह से पाकिस्तान में शामिल होने के बाद भी बलूचिस्तान में अलगाववादी और राष्ट्रवादी आंदोलनों का सिलसिला जारी रहा. 1948 में ही प्रिंस अब्दुल करीम ने पाकिस्तान के खिलाफ सशस्त्र विद्रोह शुरू कर दिया था.
इस तरह कलात की कहानी केवल एक रियासत के विलय की कहानी नहीं है. यह बलूच पहचान, स्वायत्तता और पाकिस्तान की संघीय व्यवस्था को लेकर लंबे समय से चले आ रहे विवाद की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि भी है. 11 अगस्त को बलोच राष्ट्रवादी संगठनों द्वारा स्वतंत्रता दिवस के रूप में याद किया जाना इसी ऐतिहासिक विवाद से जुड़ा है.