नई दिल्ली: पश्चिम एशिया का मौजूदा संघर्ष अब सिर्फ ताकत का नहीं, बल्कि पैसे और सहनशक्ति का इम्तिहान बन गया है. ईरान सस्ते हमलावर ड्रोनों से अमेरिका और इजरायल की महंगी एयर डिफेंस सिस्टम को चुनौती दे रहा है. जहां ईरान कम खर्च में बड़े पैमाने पर हमले कर सकता है, वहीं रक्षक पक्ष हर ड्रोन रोकने के लिए करोड़ों रुपये के मिसाइल खर्च कर रहा है. विशेषज्ञों का कहना है कि यह लागत असंतुलन लंबी लड़ाई में ईरान को फायदा पहुंचा सकता है. हालिया हमलों ने इस हकीकत को और साफ कर दिया है.
ईरान ने शाहेद-136 जैसे ड्रोनों को बड़े पैमाने पर बनाने के लिए तैयार किया है. ये साधारण इंजन, बाजार के पार्ट्स और आसान गाइडेंस सिस्टम पर चलते हैं. कीमत महज 20,000 से 50,000 डॉलर के बीच है, जो क्रूज मिसाइल से कहीं कम है. रणनीति संख्या पर टिकी है-गुणवत्ता से ज्यादा मात्रा. इससे ईरान बार-बार हमले कर सकता है बिना भारी आर्थिक बोझ के. हाल के हमलों में इसी का फायदा दिखा.
एक शाहेद ड्रोन को मार गिराने के लिए पैट्रियट मिसाइल का इस्तेमाल होता है, जिसकी कीमत 40 लाख डॉलर तक पहुंचती है. लागत अनुपात 20:1 से 100:1 तक हमलावर के पक्ष में है. खाड़ी इलाके में हालिया ड्रोन लहरों ने रक्षकों को तेजी से स्टॉक खर्च करने पर मजबूर किया. विश्लेषक इसे 'लागत विनिमय समस्या' कहते हैं. इससे रक्षक पक्ष धीरे-धीरे आर्थिक रूप से कमजोर पड़ता है.
ईरान के पास हजारों शाहेद ड्रोन तैयार हैं, और उत्पादन क्षमता मजबूत है. हाल के अनुमानों में उत्पादन तेजी से बढ़ा है. वे लंबे समय तक रोजाना सैकड़ों ड्रोन लॉन्च कर सकते हैं. वहीं अमेरिका-इजरायल के इंटरसेप्टर स्टॉक ऐसे दबाव में जल्दी खत्म हो सकते हैं. यूक्रेन युद्ध में भी यही पैटर्न देखा गया, जहां सस्ते ड्रोन ने महंगे बचाव को थका दिया.
विशेषज्ञ ईरान की रणनीति को 'आकर्षण युद्ध' मानते हैं. वे तकनीकी मुकाबला नहीं करते, बल्कि रक्षकों को थकाते हैं. सफल घुसपैठ से इंफ्रास्ट्रक्चर को नुकसान और मनोवैज्ञानिक असर बढ़ता है. जीत अब सिर्फ युद्धक्षेत्र पर नहीं, लंबे समय तक लड़ने की क्षमता पर टिकी है. थिंक टैंकों की रिपोर्ट्स में चेतावनी है कि सस्ते ड्रोन युद्ध को हमलावर के पक्ष में झुकाते हैं.
अमेरिका और इजरायल लागत कम करने के लिए नए रास्ते तलाश रहे हैं. इजरायल का आयरन बीम लेजर सिस्टम प्रति शॉट सिर्फ 2 से 5 डॉलर का खर्च करता है. यह मिसाइलों से बड़ा बदलाव है. हालांकि अभी यह मुख्य रूप से इजरायल में तैनात है और सीमित है. लेजर और इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम से संतुलन बहाल करने की कोशिश जारी है, लेकिन व्यापक इस्तेमाल तक चुनौती बनी रहेगी.